लौट आओ ,प्रिये
कितनी चीजें
लौट आती है
अपनी जगह पर
पतझड़ के बाद
वसंती हवा के साथ
वृक्षों में कोंपले
लौटती है जैसे
शाम होते ही
घोंसलों में पंछी
लौटते हैं जैसे
तुम चाहो
तो वैसे ही
या फिर
उम्मीद की नई परिभाषा लिए
लौट सकते हो,
मेरे पास
हम दोनों के बीच
उगा है
जो प्यार का बचपन
उसके लिए भी
तुम लौट सकते हो,
लौट आओ , मेरी प्रिये ।
तुम कभी भी
लौट सकती हो
समय बहुत है
पर समय का क्या है ?
वो तो रहेगा ही
हो सकता है
मैं न रहूं !
- हिमांशु भारद्वाज


