मैं तुम्हें क्या देता
मेरे पास
अवसाद था
घृणा थी
उन्माद था
तृष्णा थी
क्रोध , अहंकार था
जूते थे , नाल था
और उन पर टिका हुआ
एक लिजलिजा भाल था ।
शब्द थे मगर दूसरों की भाषा बोलते थे
अनुभव ,संवेदन , संप्रेषण
सभी पाल वाली नाव की तरह डोलते थे
एक बीमार दबी - सहमी मिमीयाती
और बार -बार मरने वाली आत्मा थी
जो इस धनुषाकार शरीर के
किसी कोने में रहती थी
सच पूछो तो एक मौत ही थी
जो हर कदम पर साथ दे रही थी
तो क्या तुम्हें मौत देता
यह जानते हुए भी कि
हजार - हजार मौतें तुम्हारा भी पीछा कर रही है ,
पर तुम उन्हें चकमा देने में माहिर हो गए हो ।।
-हिमांशु भारद्वाज


