लिखकर और कुछ भी ,मन में होर लिए।
चले कुछ काम करते है, अमन को बदनाम करते हैं।
मिल कर भी कुछ न मिला, फिर भी मिलते हैं।
बड़े कठोर दिल है साहब, हमे बदनाम करते हैं।
यही तो काम करते हैं, अमन को बदनाम करते हैं।
तारीख को याद किया, बहुत फरियाद किया।
चले अब चलते है, स्वप्न की ओर चलते है।
करने कुछ काम चले , अमन को बदनाम करे।
बाते बहुत हों गई, चलो कुछ काम करते हैं।
रह कर सरीफो की बस्ती में, अमन को बदनाम करते हैं।
कत्ल जो उसने किया, वफा जो मुझे मिला।
चलो कुछ काम करते हैं, अमन को बदनाम करते हैं।
तोड़ के दिल ये मेरा , शहर की ओर चलते है।
भरी महफिल में साहब, ऐसा कुछ काम करते हैं।
अमन को बदनाम करते हैं अमन को बदनाम करते हैं।
मन को क्रोध बना जाने किस ओर चलते हैं।
शहर की ओर चलते है, कही किसी ओर चलते हैं।
कवि अमन कुमार शर्मा
हिंदी विभाग सदस्य भागलपुर विश्वविद्याल
बीहट नगर परिषद बेगुसराय बिहार


