गुमसुम सा हूँ इनदिनों,
किसी की परछाई को लिए।
गुमसुम सा हूँ इनदिनों ,
तुम्हारी ख़ामोशी में।
हिदायत दी जाती है ,
न देखु तुझे यु मुस्कुराता।
शायद इसलिए गुमसुम हूँ ,
की तुम मुझे देख कर खुश हो।
वकायदा मेरी फितरत नहीं रही
किसी ओर के चाँद को देखने की।
नग्मे सुनने वाले है मेरी महफ़िल में,
दिल को सताया न करो।
जितना है मेरा दिल तो ,
मुझे रुलाया न करो।
पता करो की शहर का माहौल क्या,
क्या तुम ख़ुशी हो इसका मोल क्या है।
मत करो सरारत तुम मेरे साथ ,
सोते समय रातो में बस तेरी बात।
गुमसुम सा हूँ इनदिनों ,
तुम्हारी ख़ुशी को दबाये।
कवि अमन कुमार शर्मा


