यथार्थ का दीपक


अंधकार जब छाता है

मानव बाती हो जाता है

विरह तेल में भीगता है

यथार्थ का दीपक जलता है।


जो उजियारा छिटकाता है

अमावसी कुटिया बनाता है

नभचर की महिमा चुराता है

थलचर का भूषण हो जाता है।


दृष्टिगोचर हो विकार

अपांगक्रुध्दर्शनोपहार

संशय भीतर लेता आकार

अग्रेगामिनी मन का विचार।