तेरी यादों में गुज़रें,ये जो चन्द साल है

हमें तेरा नहीं,बीतें लम्हो का मलाल है


अब हमें यहाँ किसिकी भी परवा नहीं

फिर भी क्यूँ मूझे सिर्फ़ तेरा ख़याल है


तु ये न सोच के क़ूछ पाया ही नही मैंने

तेरे शहेरमें मेरी वफ़ा की आज मिशाल है


होने से मेरी होती थी ज़िन्दादिली जहाँ

अब तो मूझे खुदके होने पे सवाल है


अंजाम मालूम है हमें मोहब्बत का

में और मेरे चाहनेवाले सब बेहाल है


ख़ूब निभायी वफ़ा उसने किसी और के साथ

सब मेरी इश्क़ की नसीहत का कमाल है...

     

 डो कौशिक महिड़ा