......सुनो(वैदेही)


मैं खुद को खींच लाया हूं

तेरी सांसों से "सींच" के

जैसे तुमने मुझे नींद से

जगाया हो चद्दर को "खींच" के


मैं तो चल दिया था "जमाने" से

अरमानों के दर्द को "सींच" के..

जाने दिया न "तूने मुझे कहीं"

लगा लिया था "सीने से भींच के"


"Raghav"