… "सुनो वैदेही"
"वट-वृक्ष" की तरह तुम्हारी "यादों" से
"अंकुरित" होती निरंतर "विरह-शाखायें"
प्रति-पल मेरे ह्रदय को "जड़ता" देता "दर्द"
यही मेरे "वैदेह-प्रेम" की पूर्ण "संम्पनता" है..।।
"""आंखों की आंखों में बात"
बातों का ह्रदय पर "प्रतिघात"
"प्रतिघात" से बना "जल-प्रपात"
"जल-प्रपात" का अधरों पर "संताप"
संताप पर समय-छींण का "पश्चाताप"
"पश्चाताप" से बढ़ता हुआ "मन का ताप"
मन-ताप से "उपजा" उसका "प्रेम-जाप"
प्रेम-जाप मध्य "अघोरी" "तम का श्राप"
बिन-तुम्हारे शून्य हो जाना समस्त "भाव"
बस यही मेरे प्रेम की "प्रतिबद्धता" है.।।
@राघव


