.....सुनो "वैदेही"


मेरे प्रेम की "अवधारणा" हो "तुम"

मेरे ह्रदय की "सकल-धारणा" हो "तुम"

मन "सखी" चंचल "मति"

नाड़ी में बहती मेरी "रक्त-गति"

सम्पूर्ण "देह" को "व्याकुल" करती

"विरह-वेदना" की "संकल्पना" हो "तुम"

आत्मा" "अधीर" होती है "तुममें"

"वैदेह-मिलन" की "परिकल्पना" हो "तुम"..



@राघव