सुनो "वैदेही"-(३)
"तुमको निहारने"
के बाद मेरे "ह्रदय" में
भावों का "मधुर मृदंग" सा
शोर "व्याकुल" करता है..
"सांसों का उग्र होता"
"तापमान" ह्रदय को ही नही
अपितु "बाह्य वातावरण" को भी
"ग्रीष्म ऋतु"
में "परिवर्तित" करता है
मिलन के "आभास" का
यह प्रथम चरण है"...।।
®aghav


