...सुनो "प्रेयसी"
"शैंन-शैंन" दिन की
"यौवनता" ढलने लगी
तुम्हारी "यादों की झुर्रियां"
"शबनमी" रात की
"जवानी को छलने" लगी..।।
चाँद की "शीतल-आभा" से
"सांसे" मेरी "जलने" लगी
बहती हुई "पुरवाई"
"विरही" सी लगने लगी..।।
प्रेम-विक्षोभ की बूंदे भी
तुम्हें ओस की मोती लगने लगी..।।
@राघव


