......"निशा"


तुम "शाम-ढले" चली आती हो

मेरी अँखियों को "भरमाती" हो

स्वछन्द अंधेरा "प्रत्यक्ष" "टहल" रहा

तुम आंखों में "तपन" जागती हो

तुम क्यों शाम ढले चली आती हो

"आंखों में नीर"

"ह्रदय में नीर"

"यादों का नीर"

"बातों का नीर"

हर-पल "विरह नीर" बहाती हो..

तुम शाम ढले "दुल्हन" जैसी

मेरी आँखों मे बस" जाती हो..।।



@राघव