......."नादां"


__________सा है "इश्क़"....मेरा

बड़ा बै-ग़ैरत निकला "अश्क़" मेरा

बहा जाता है "यूँ-ही" "खामखाँ" याद में

बसा जाता है यूँ-ही "खामखाँ" अक्स तेरा...।।


आंखों में "ख़्वाब" "यूँ-ही" "झूल" जाते हैं

आंखों में अश्क़ यूँ-ही ठहराना भूल जाते है


अधर भी खैर" नही खाते हैं "बहक" जाते हैं

सुबक के "आलाप" देते है..चुप्पी तोड़ देते हैं

यूँ-ही "कशमकश" में 

हम "शहर" छोड़ देते हैं

भूलकर "फ़ज़ीहत" "कदम" मेरे

उसकी गली में ही सैर देते हैं..।।



@राघव