...दर्द की "आवाज़"


कौन कहता है "नही होती"

होती है मगर

किसी और के 

श्रवण-पिंडो को

सुनाई नही देती

"चीखती चिल्लाती"

मन को "व्यथित" करती

आत्मा को करुण द्रवित करती

चक्षुओं को अश्रु" सहित करती

ह्रदय में स्वछंद तैरती

कानों से न सुनी जाने वाली

"करुण पुकार" "दर्द" है..