नौजवानों को रोज़गार के नाम पर ठगना,
क्या यही हैं राजनीति?
जाति के नाम पर समाज को बटना,
क्या यही हैं राजनीति?
पत्रकार की कलम को खरीदना,
क्या यही हैं राजनीति?
किसानों की फसलों को पैरो तले रौंदना,
क्या यही हैं राजनीति?
पीड़ितों के न्याय को बेचना,
क्या यही हैं राजनीति?
सरकारी ख़ज़ाने से अपनी तिजोरियां भरना,
क्या यही हैं राजनीति?
कुदरती संसाधनों को अपने उद्योगपति दोस्तोमें बताना,
क्या यही हैं राजनीति?
                                 -कौशल ठक्कर