बहुत भाती हैं
पुती मजारें हरी-हरी
जालीदार टोपी गोल कटोरे जैसी
और चढ़ाना चादर दरगाहों पर ।
शिखा त्यागना
गरियाना
अपने पूर्वजों को
वेदों और मनुस्मृतियों को
लतियाना और जलाना
बहुत भाता है ।
जब-जब हमने सच बोला
तुमने उसे झूठ ठहराया
जब-जब हमने चर्चा की
जीवन के तत्वों की
तुमने उसे विषवमन कहा ‘धर्म’ का ।
जब-जब हमने स्मरण किया
दाहिर और चंद्रशेखर का
तुमने उसे ‘विषवमन’ कहा ‘राजनीति’ का ।
तुम जैसे अवसरवादी
द्वेषी भारत के
घाती स्वजनों के
बना रहे एक और भूमिका
कासिम के स्वागत की ।
निश्चित ही गुणसूत्र तुम्हारे
थे नहीं कभी आर्यों के
इसीलिये गुणगान कभी
ना सुने तुम्हारे मुँह से ।
तुम मोलस्का से
छिपने के अभ्यस्त
कठोर कवचों में
श्रापित हो ढोने
अपने ही शव को ।
धर्म नहीं विषवमन कभी हो सकता है
यदि हो सकता है
तो नहीं कभी तू भारत का हो सकता है ।
