पच्चीस अगस्त को मुम्बई के गेटवे ऑफ़ इण्डिया और झवेरी बाज़ार में उग्रवादियों द्वारा दो भयानक बम विस्फ़ोट किये गये । मुम्बई भ्रमण के लिये आये पाठक जी विस्फ़ोट से कुछ ही मिनट पहले गेटवे ऑफ़ इण्डिया से होकर निकले थे । मृत्यु और जीवन के बीच समय की एक क्षीण रेखा को पार कर वे विजयी हो चुके थे पर यह विजय उन्हें प्रसन्नता नहीं दिला सकी । धमाके की आवाज़ सुनकर वे वापस पलटे । क्षत-विक्षत शवों और रक्तरंजित घायलों को देख भावुक हृदय पाठक जी वहीं रो पड़े । अनायास ही उन्हें पत्नी और बच्चों की स्मृति ने आ घेरा ।

इस भीषण आतंकी घटना के पश्चात् उनके जीवन में दो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुये । एक तो यह कि वे अब नियमित रूप से पूजा-पाठ करने लगे थे और दूसरा यह कि उन्होंने नियमित दैनन्दिनी लेखन को अपना मित्र बना लिया । आतंकवादी घटना ने उन्हें जीवन के प्रति संवेदनशील बना दिया था । समाज की हर छोटी-बड़ी घटना का वे सूक्ष्मावलोकन करते और फिर अपने तरीके से उसका विश्लेषण करते । रात में जब वे उस विश्लेषण को शब्दों के परिधान से सुसज्जित करते तो उनकी दैनन्दिनी में वह घटना एक कहानी बन जाती ।

अभी कुछ दिन पहले वे अपने नगर के एक परिचित सेठ के साथ उनके व्यापारिक कार्य में सहयोग करने कोलकाता गये थे । वहाँ से लौटते ही वे लिखने के लिये अधीर हो उठे, स्नान व भोजन से निवृत्त होकर जब वे बैठे तो जो कहानी कागज पर उतरी वह कुछ इस प्रकार थी –

दिनांक – ०९.०९.२००३, कोलकाता । होटल नीरानन्द से नीचे उतरकर सेठ धरमचन्द ने टैक्सी चालक को आदेश दिया-  “के.सी. दास की दुकान”।

टैक्सी में बैठते-बैठते सेठ जी ने अपने ज्ञान को प्रकट किया, बोले- “दुनिया में रसगुल्ले की खोज सबसे पहले इसी दुकान में हुयी थी”।

थोड़ी ही देर में टैक्सी के.सी. दास की दुकान के सामने खड़ी थी । दुकान में पहुँचते ही सेठ जी ने कूपन ख़रीदा और नौकर से फ़रमाया – “दो जगे रसगुल्ला और सन्देस लिआ”। 

हम दुकान के ऊपरी हिस्से में चले गये, वहाँ मुश्किल से सात-आठ मेजों के लिये ही स्थान था । हम लोग पीछे की अंतिम मेज पर पहुँचे । मुझे रसगुल्लों से अधिक उन चित्रों ने आकर्षित किया जो कलाप्रेमी हलवायी ने दीवाल पर एक पंक्ति में टाँग कर सजा रखे थे । हलवायी की कलात्मक अभिरुचि प्रशंसनीय थी । ये आधुनिक पेंटिंग्स थीं और शायद महंगी भी । मैं उठकर एक पेंटिंग के समीप गया, अभी देख ही रहा था कि सेठ जी ने पुकारा- "पाठक जी !"

आकर देखा, मेज़ पर मिठाई लग चुकी थी । सेठ जी अधीर हुये जा रहे थे, मैंने उन्हें अब और प्रतीक्षा कराना उचित नहीं समझा ।

के.सी. दास की दुकान से निकलकर गाड़ी में बैठते ही ड्रायवर ने पूछा- "अब कहाँ?”

सेठ जी बोले- "धरमतल्ला चल... नहीं, पहले सियालदह... भोजन वहीं जीमेंगे”।

रास्ते में हुगली के पुल से होकर जाते समय सेठ धरमचन्द ने अचानक प्रश्न किया- "पाठक जी ! आपने देखा, कलकत्ते में पति-पत्नी के बीच उमर का अंतर कितना है? बाप-बेटी जैसा नहीं लग रहा आपको?”

मेरे मुँह से अचानक निकला – “अयँ !... मैने तो ध्यान नहीं दिया"

सेठ बोले- “तो आपने कल से आज तक कलकत्ते में देखा क्या?” 

मुझे लगा- कोलकाता में देखने-समझने का यह भी एक विषय है । सचमुच, अभी तक आते-जाते किसी भी जोड़े पर मैंने लेश भी ध्यान नहीं दिया था । मनुष्यों की भीड़ से छलकते इस जंगल में किस-किस पर ध्यान केन्द्रित किया जाय! मैं उनके प्रश्न का क्या उत्तर देता? यह तो अच्छा था कि बिहारी ड्रायवर बातचीत में बराबर हिस्सा ले रहा था । उसने इसके सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक... कई कारण गिनाये ।

सेठ जी ने कहा- "सवाल जे नईं है कि उमर में इतना अंतर क्यों है, बल्कि जे है कि इसका परिणाम क्या होगा? क्या इनका अपना दाम्पत्य जीवन और साथ ही समाज भी इसके दुष्प्रभावों से अछूता रह सकेगा कभी?”

ड्रायवर चुप रहा, मैं भी। फिर सेठे जी ने अपने जीवन के गूढ़तम अनुभवों के आलोक में इसके निश्चित परिणाम गिनाने प्रारम्भ किये। वे एक पक्षीय बोलते रहे, बीच-बीच में ड्रायवर हाँ में हाँ मिलाता रहा। मुझे इस विषय में कोई रुचि नहीं थी, सो चुप ही रहा।

सियालदह पहुँचकर ड्रायवर ने एक छोटे से भोजनालय के सामने गाड़ी रोक दी। वहाँ आसपास की गन्दगी से उठ रही दुर्गन्ध से सेठ जी कुपित हो गये, बोले -"यहाँ कौन जीम सकेगा? जल्दी ले चल यहाँ से”।

ड्रायवर ने पूछा- "तब और कहाँ?” 

उत्तर मिला- "सोनागाछी”।

ड्रायवर ने एक खीझ भरी दृष्टि से उनकी ओर देखकर गाड़ी आगे बढ़ा दी ।

सोनागाछी मेरे लिये एक नितांत नया अनुभव सिद्ध हुआ । सभ्य और गणमान्य लोगों की दृष्टि में वह कोलकाता का सड़ा हुआ नासूर था, जीवित नारी अंगों का सड़ाँध मारता बाज़ार था, मरे हुये लोगों का ज़िन्दा मरघट था, पाप का कुण्ड था, समाज को नर्क में ढकेलने वाले पापियों का अड्डा था... और भी न जाने कितनी वर्ज्य विशेषतायें थीं सोनागाछी की ।

पर सच कहूँ, मुझे तो वह किसी सुंदर नारी के फटे हुये और मैले-कुचैले अंग-वस्त्रों सा ही प्रतीत हुआ । सोनागाछी... फटा और गन्दा... किंतु रंग-बिरंगा... । रंग-बिरंगा तो इतना कि भद्रगण भी उसके आकर्षण में डूबने से स्वयं को बचा नहीं पाते। इतना गन्दा और त्यक्त्य होते हुये भी भीड़ से मुक्ति नहीं मिलती उसे । भीड़ तो वहाँ जैसे बजबजाते समाज से निकलकर छलकती रहती है... दिन-रात। इसीलिये तो सोनागाछी अपने जन्म से ही पीड़ित है अनिद्रा के रोग से ।

सभ्य गणमान्य, जिन्हें दिन में किसी के द्वारा स्वयं के पहचाने जाने का भय़ रहता है, रात के अन्धेरे में छलकते रहते हैं वहाँ । सोनागाछी को जागना पड़ता है तब... भूखे पेट के लिये । किंतु दूर से आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों, व्यापारियों एवं उत्तर-प्रदेश और बिहार से आये श्रमिकों को अपने पहचाने जाने का भय नहीं होता । पहचान छिपी रहे तो सोनागाछी का हर ग्राहक भद्र और गणमान्य ही बना रहता है । इसीलिये कुछ लोग तो निर्भय हो दिन में भी वहाँ जाने से संकोच नहीं करते । रात का थका-निचुड़ा सोनागाछी दिन में भी सो नहीं पाता तब... पेट के लिये, स्पन्दित होता रहता है अहर्निश... बिना किसी परिवाद के ।

व्यस्त कोलकाता के जीवित रहने में सोनागाछी के इस स्पन्दन की भी एक अस्वीकृत सहभागिता है । कोलकाता को जीवन देने वाले थके-हारे श्रमिकों, भ्रमण पर आये पर्यटकों, पाप कर्म से धनवान बने मनचलों, अपने शरीर की पाशविक शक्ति के बल पर भयादोहन एवं स्थानीय आतंक से अपनी जीविका चलाने वाले बलवान मानुषों और यहाँ तक कि बड़े-बड़े सरस्वतीपुत्रों एवं लक्ष्मीपतियों तक को जीवन की ऊर्जा प्राप्त होती है यहाँ की सड़ी हुयी खाद की ऊर्जा से। भद्रजनों को जीवन की एकरसता से मुक्ति मिलती है यहाँ आकर । सरकारी नौकरी में पदोन्नति का कच्चा "माल" मिलता है यहाँ की मण्डी में । और कभी-कभी व्यापारिक समझौतों पर ठप्पा भी लगता है यहीं की ऊर्जा से प्रेरणा पाकर ।

अपने पेट की भूख मिटाने के लिये यहाँ आकर शरणागत हुयी किसी स्त्री का शरीर न जाने कितने पुरुषों की भूख मिटाने का साधन बन जाता है... धरती की तरह । भूख, जो शरीर से शांत होती है... भूख, जो रोटी से शांत होती है । इस भूख को मिटाने वालों में हैं असंख्य ग्राहक, इंसानियत के निर्दयी दलाल, व्यवस्था को अव्यवस्थित बनाये रखने में व्यस्त रहने वाली पुलिस, अवसर मिलते ही देश को बेच देने में भी संकोच न करने वाले राजनेता, धनलोलुप चिकित्सक और अवसरवादी ब्यूटीपार्लर्स भी । ये सब सोनागाछी के सहव्यवसायी हैं... घात लगाकर बैठे हुये । सोनागाछी इन्हें भी पोषण देता है । अब आप ही बताइये, इतने-इतने परिवारों को पालने की क्षमता रखने वाला सोनागाछी सड़ा नासूर या ज़िन्दा मरघट कैसे हो सकता है भला ! वह तो जीवित है, अहर्निश स्पन्दनशील है... अपनी तिरस्कृत और अनादृत शक्ति से भी स्पन्दित ।

सेठ धरमचन्द जीवन के सत्तावन वसंत देख चुके थे और इतनी ही बरसातें भी । वे आज भी बरसात में आग लगा देने की अदम्य लालसा से सराबोर थे ।

मुख्य मार्ग से अन्दर की ओर मुड़ते ही टैक्सी धीमी हो गयी । मैने देखा, सड़क पर सोनागाछियाँ थीं...  उनके दलाल थे । सोनागाछियाँ घरों के अन्दर भी थीं और घरों के बाहर भी, छज्जों से झाँकती हुयीं भी थीं और ज़िन्दगी की डोर से लटकती हुयीं भी। भाँति-भाँति की सोनागाछियाँ... बाला, किशोरी, यौवना, तरुणी... सभी वयस की... , अपने स्वर्णगात को मिट्टी बनाने न जाने कहाँ-कहाँ से आकर यहाँ डेरा जमाये हुयी थीं । अपनी जड़ों को निर्ममता से काटकर फेक चुकीं ये सोनागाछियाँ न जाने किस पुष्प-पल्लव की आशा के स्वप्न में जी रही थीं ।

मैंने दिन के उजाले में साफ-साफ देखा, सड़क पर ही निर्लज्ज अंग प्रदर्शन और मोलभाव । मांसल स्पर्श, भोग, भावना, विवशता, नैतिकता, मानवता... सब का मोलभाव । स्वर्णगात धन की वर्षा करता था... स्वर्णगाछ बनकर, विनिमय में लक्ष्मी का निर्लज्ज और पाषाणी प्रयोग ।

मानव शरीर की मण्डी... सोनागाछी... माटीगाछी... । यहाँ आकर तो अश्लीलता को भी अपनी परिभाषा नये सिरे से गढ़नी होगी ।

टैक्सी के धीमी होते ही खीसें निपोरे रूप के कई दलालों ने आकर घेर लिया । एक बिहारी दलाल ने पूछा- “क्या चाहिये सेठ ?”

“चाइनीज़ मिलेगी ?”

“मिलेगी"

“... और गोवानी?”

“सब मिलेगी, गाड़ी से नीचे तो आइये”! 

“भाव बोल... !" –सेठ जी ने उसी तरह पूछा जैसे कि वे प्रायः शहद, शतावरी, सफ़ेद मूसली या विडंग ख़रीदते समय पूछा करते हैं ।

अपने धन्धे में पारंगत दलाल ने कहा –“ऐसे कैसे सेठ... ! अन्दर आइये, माल देखिये, पसन्द कीजिये... भाव तो तभिये न होगा”।

“ठीक है, खाना खाकर एक घण्टे में आयेंगे अभी”।  -सेठ ने आश्वासन दिया।

“आइयेगा ज़रूर... दिल खुश कर देंगे आपका।" –दलाल ने चारा फेका ।

मैने देखा, एक साँवली सी लड़की जो केवल अधोवस्त्रों में थी, मेरी ओर इस तरह देखे जा रही थी जैसे कि मिन्नतें कर रही हो । वह दलालों की भीड़ से अलग सड़क के एक ओर खड़ी थी... चुपचाप! मैने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी पर उसकी बोलती आँखों और उदास चेहरे को पढ़ने की एक बार चेष्टा अवश्य की । इतने में गाड़ी आगे बढ़ गयी । लड़की ललचायी दृष्टि से देखती रह गयी ।

गाड़ी दूसरी गली में मुड़कर वाप मुख्य मार्ग पर आ गयी । ड्रायवर ने पूछा- ”अब किधर?”

उत्तर मिला- "बहू बाजार चल!”

(शेष अगले अंक में)