तिरपठिया ने सुना तो अवाक रह गया, उसके मुँह से बस इतना ही निकला – “जर्मनी !”
“हाँ! जर्मनी ! अब वह फ़्रेंकफ़र्ट स्कूल में रिसर्च करेगी । करात बाबू ने जुगाड़ लगायी और उन्हें एक स्पॉन्सर भी मिल गया”। - चिरईं बाबू ने एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह सूचना दी ।
“प्राथमिक शाला की अध्यापिका की बेटी जर्मनी में रिसर्च करेगी ... और मगध विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर गजानन त्रिपाठी का बेटा सुधीर त्रिपाठी बिहियाँ में मुराई कबारेगा ...”। – तिरपठिया ने एक ठण्डी आह भरी ।
लछमन जी ने तसल्ली देने के भाव से ईर्ष्या में डूबते हुये कहा – “सब लाल सलाम का कमाल है”।
चिरईं बाबू ने जोड़ा – “फिर फँसा लिया किसी कुबेर को उन लोगों ने अपने जाल में । राष्ट्रवादियों को तो कोई पूछता ही नहीं इस देश में । संघ के लिए चन्दा माँगने जाओ तो सौ रुपये के लिए हजार चक्कर लगवायेंगे सेठ लोग... जैसे कि बड़ा अहसान कर रहे हों, और करात जैसे लोगों के लिए खजाना खोले बैठे रहते हैं”।
जगनू मिसिर अभी तक चुप थे, किंतु लछमन जी और चिरईं बाबू की बात सुनकर सुलग उठे, बोले – “लछमन जी! हम तो कुबेर नहीं हैं, सात साल हो गये, छह सौ रुपये कब तक वापस करेंगे आप? और चिरईं बाबू ! तीन साल हो गए, आपने भी अभी तक किराना वाला उधार नहीं चुकाया । हमने तो राष्ट्रवादी समझ कर ही दिया था आपको, फँस तो हम भी गए न !”
लछमन जी बिगड़ गए, बोले – “राष्ट्रवाद को बीच में मत लाइये मिसिर जी ! आपको जो कहना है हमसे कहिये, किंतु हमारे राष्ट्रवाद पर सन्देह करने का आपको कोई अधिकार नहीं है । राष्ट्र के लिए अपनी जान दे सकते हैं हम । रही बात छह सौ रुपए की, तो आपने कोई अहसान नहीं किया है हम पे । राष्ट्र के लिए हम घर-बार त्याग कर दिन रात जूझ रहे हैं । लोग मंजूबाला पर इतना खर्च कर रहे हैं, आपकी जान छह सौ रुपये पर ही अटकी हुयी है” ।
चिरईं बाबू भी पीछे रहने वाले नहीं थे, शालीनता को गोली मार दी और तू-तड़ाक पर उतर आए, बोले – “तेरे जैसे लोग ही संघ को बदनाम करते हैं । संघ के नाम पर कलंक है तू । धूर्त तो तू था ही अब झूठ भी बोलना शुरू कर दिया । शर्म भी नहीं आती तुझे बौद्धिक प्रमुख पर आरोप लगाते हुए, तुम्हारी दुकान से किराना लिया ही कब था हमने”?
जगनू मिसिर आहत हुये, बोले – “आप जैसे संघियों का यही आचरण तो वामपंथियों का सम्बल है । आप लोगों के राष्ट्रवाद से अच्छा तो करात बाबू और मंजूबाला का राष्ट्रद्रोह है । पैसे वे लोग भी हजम कर जाते हैं लेकिन आप लोगों की तरह झूठबोलकर नहीं । वे रंगदारी से पैसे माँगते हैं और स्पष्ट कह देते हैं कि यह उधार नहीं रंगदारी है । और इससे पहले कि आप लोग हमारा बहिष्कार करें, हम अपने आपको संघ से मुक्त करते हैं, अभी... इसी क्षण से”।
जगनू मिसिर ने काली टोपी सिर से उतारी, मधुमालती की शाखा पर लटका दी, पास में ही अपना दण्ड भी टिका दिया फिर शांत भाव से शाखा स्थल से चल दिए ।
लछमन जी ने जाते हुये मिसिर जी को दाँत पीसकर सुनाते हुये कहा – “गद्दार कहीं का ! अच्छा हुआ जो चला गया, अन्यथा आज तो दण्ड-प्रहार से इसका शिरभंजन होना निश्चित था”।
जगनू मिसिर ने सुना किंतु बोले कुछ नहीं, उसी तरह शांत भाव से चलते रहे । थोड़ी देर पहले तक झुलस रहे मिसिर के सिर से मानो एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो । मार्क्सवाद के धुर विरोधी रहे जगनू मिसिर के मन में पहली बार मंजूबाला के प्रति कोमल भावों का उदय हुआ ।
