१. “बिना रणनीति”
फिर न कहना चेताया नहीं
कहे देता हूँ
नहीं जीत पाओगे रण
बजा-बजा कर थोथे गाल ।
२. “आत्मघाती तुष्टि”
थोड़ा सा गन्दा है
उनका एक बच्चा
हम मार देंगे
अपने साफ-सुथरे बच्चों को
ताकि ख़ुश हो जाय
उनका गन्दा बच्चा ।
३. “असत्य के लिये हठ”
अंधेरों को नहीं बना सकते
उजाले
अँधेरों को तो भगाया जाता है
करके उजाले ।
पर उसने हठ किया
कि वह बना देगा अँधेरों को ही उजाला ।
आज वही अँधेरे
निगल रहे हैं
उजालों को ।
नकली राष्ट्रीय पुरुष!
तुम हमारे घोर आक्रोश के पात्र हो ।
४. “झाड़ियाँ”
कोई राह
नहीं होती मुकम्मल
सदा के लिये ।
झाड़ियों का क्या
कहीं भी उग आती हैं ।
कौन बताये यह सब !
सदियों से सोये पथिक को ।
शहर में आज फिर
धार्मिक उन्माद की ख़बर है ।
६. “प्रतीक्षा”
क्या सारे चने
हो गये हैं निर्वीर्य !
भाड़ को
कबसे प्रतीक्षा है
एक चने की !
