चाय को लेकर शोधार्थियों द्वारा परस्पर इतनी विरोधी बातें कही जाती रही हैं जिससे स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने वालों में भ्रम की स्थितियाँ निर्मित होती रही हैं । सामान्य धारणा यह है कि चाय पीने से स्फूर्ति, एकाग्रता और सजगता में थोड़ी सी वृद्धि होती है, विशेषकर थकावट की स्थिति में चाय पीने से पुनः स्फूर्ति का अनुभव होते देखा जाता है । इस प्रभाव का एक कारण तो साइकोसोमैटिक है और दूसरा बायोकेमिकल कारण है कैफीन जो चाय और कॉफ़ी का एक घटक है । किंतु अधिक मात्रा में ली हुयी यही कैफीन बहुत हानिकारक भी हो सकती है । चाय को जितना अधिक उबाला जायेगा उबलते पानी में कैफ़ीन की मात्रा उतनी ही अधिक बढ़ती जायेगी जिसके कारण *दूध वाली चाय या खूब उबाली हुयी चाय लेने से Constipation होता है । ऐसी चाय के अधिक सेवन से Irregular heartbeat, headache, restlessness, Insomnia और dizziness जैसे गम्भीर विकार उत्पन्न हो सकते हैं । गर्भिणी और दूधपिलाने वाली माताओं को इसके सेवन से बचना चाहिये*।

चाय को यदि वैज्ञानिक तरीके से बनाया जाय तो तनाव में कमी, रक्तचाप नियंत्रण आदि में हितकारी इसके औषधीय गुणों का लाभ लिया जा सकता है ।

चाय में दूध और चीनी का मिश्रण चाय के हानिकारक गुणों में वृद्धि करता है इसलिये बिना दूध और चीनी की चाय स्वास्थ्य के लिये लाभदायक है विशेषकर यदि पीते समय इसमें नीबू का थोड़ा सा रस और मिला दिया जाय । सामान्यतः चाय में पाये जाने वाले एण्टीऑक्सीडेंट्स का मात्र 20 से 35 प्रतिशत भाग ही हमारा शरीर ग्रहण कर पाता है जबकि *नीबू का रस मिला देने से इस क्षमता में 86 प्रतिशत तक की वृद्धि* होती देखी गयी है । वास्तव में चाय के अच्छे गुणों के लिये एण्टीऑक्सेडेंट्स की भूमिका ही सर्वाधिक है ।   

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं चाय बनाने के लिये एल्यूमिनियम के बर्तनों का सदा विरोध करता रहा हूँ जिसका कारण है *एल्यूमिनियम की उच्च धात्विक विषाक्तता जो अल्ज़ाइमर्स जैसी व्याधियों की probabilities को बढ़ा देता है*।