शुकबाला कोथा का संदर्भ - दोपदी सिंघार की बारह तीखी कविताओं के साथ अम्बर रंजना पाण्डे ने साल 2016 में सोशल मीडिया पर धूम मचा दी थी । इन कविताओं को कुछ लोगों ने पेटीकोट साहित्य का नाम देते हुये रचनाकार की तीखी आलोचना की तो बहुतों ने सराहा भी । दोपदी सिंघार की बारह साम्यवादी कविताओं और अम्बर रंजना पाण्डे की प्रच्छन्न रचना शैली पर सोशल मीडिया के पाठकों की विभिन्न प्रतिक्रियाओं के सूत्र पकड़कर तब मैंने भी कुछ प्रतिक्रियात्मक किस्से लिखे थे । आप इन्हें “प्रतिक्रियात्मक गल्प” या “कथा-काव्य शैली में रचित प्रतिक्रिया” भी कह सकते हैं ।

शुकबाला ठाकुर का रहस्य

वामपंथी विचार के दुर्ग माने जाने वाले जे.एन.यू. के एक विद्वान ने दावा किया है कि वह शुकबाला को अच्छी तरह जानता है और यह कि शुकबाला एक पुरुष है जिसका वास्तविक नाम है तोताकुमार । मैं पूछता हूँ, ज्वालामुखी की गहरायी को कोई जान सका है भला ! फिर भी, यह जो तुम्हारा तोताकुमार है न, उसका वामांग शुकबाला का ही है । चिकित्सा विज्ञान के प्रथम वर्ष में ही एनाटॉमी के गुरु से यह रहस्य जानकर मैं विस्मित हुआ था । बाद में कोलकाता के सी.सी. चटर्जी ने अपनी फ़िज़ियोलॉजी की टेक्स्ट बुक में फ़ीटल डेवलपमेण्ट वाले अध्याय में इसकी विस्तार से पुष्टि कर दी तो यह प्रमाणित हो गया कि तोताकुमार के शरीर में अर्धनारीश्वर की तरह शुकबाला के अस्तित्व को कोई माई का पूत मिथ्या सिद्ध नहीं कर सकता ।

तो यह सिद्ध हुआ कि दोपदी सिंघार उर्फ़ शुकबाला की देह में कम से कम पचास प्रतिशत स्त्री तो है ही जो उद्दाम काम और काम-प्रतिशोध की रक्तरंजित कवितायें लिखती है । किंतु ठहरिये ! क्या केवल रक्तरंजित कवितायें ही ! ध्यान से देखिये... वहाँ कुछ और भी है जो विराट और रहस्यपूर्ण भी है ।

जो लोग शुकबाला को एक स्त्री मानते हैं उन्हें मैं बता दूँ कि वास्तव में शुकबाला स्त्रियों का एक समूह है । इस समूह की स्त्रियों की आयु ‘पल-पल मरती’ लाखों वर्ष है । ज्वालामुखी एक दिन में तो नहीं बन जाता न !

मुझे लगता है कि शुकबाला, गुण्डाधुर (बागा धुरवा), अबूझमाड़ और घोटुल इन चारों में कई समानतायें हैं । विशाल चुम्बकीय आकर्षण से युक्त स्वतंत्रतासंग्राम सेनानी गुण्डाधुर बस्तर के एक ऐतिहासिक और रहस्यमय युगपुरुष माने जाते हैं । थोड़े से शब्दों में उन पर कुछ लिख पाना सम्भव नहीं इसलिये उस प्रसंग को अभी छोड़ देते हैं शेष तीनों की चुम्बकीय शक्ति अद्भुत् है, लोग खिचे चले आते हैं... किसी रहस्यमयी दुनिया को अनावृत करने के लोभ में । मार्ग दुर्गम है... रास्ता अबूझ है... लोग भटक रहे हैं और जिसे जो मिल पा रहा है उसे ही शुकबाला, अबूझमाड़ और घोटुल मानकर भाँति-भाँति के दावे कर रहा है । किंतु इन तीनों को बूझ पाना हँसी-खेल है क्या ?

अबूझमाड़... आज भी अबूझ है बस्तर का यह माड़ और यह अबूझता ही लोगों के आकर्षण का केन्द्र है । जब हम बूझ नहीं पाते तो रहस्य का आकर्षण और भी गहरा हो जाता है ।

घोटुल... बस्तरियों का एक रहस्यमय संसार ! तरह-तरह की बातें... कटाक्ष भी... आकर्षण भी... कुछ सत्य भी... कुछ झूठ भी... । किंतु इस सबके बाद भी कोई दावे से यह नहीं कह सकता कि उसने घोटुल के तिल-तिल को बूझ लिया है ।

और शुकबाला ? बस्तर में वह दोपदी सिंघार है तो डायमण्ड हार्बर में नंदिता और धूपगुड़ी में शुकबाला ठाकुर, किंतु सच तो यह है कि शुकबाला धरती के हर कोने में है । वह चेतन भी है और एक वस्तु भी ...जैसे बस्तर के किसी घोटुल की अँधेरी रात, एक ओर बोनफ़ायर के ढेर में चटचट की आवाज के साथ श्मशान का सा आभास कराती जलती लकड़ियाँ, विषबुझे तीरों के साथ एक ओर रखे धनुष, धारदार टँगिया, रात में पायल सी खनकती हँसी, बीच-बीच में ठिठोली... और रात्रिकालीन क्रीड़ाशाला का एक उन्मुक्त संसार!

घोटुल वर्ज्य है बाहरी लोगों के लिये... उन लोगों के लिये जो घोटुल के लिये अपात्र हैं... उन लोगों के लिये जो रहस्य के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं और तिल-तिल को कर डालना चाहते हैं पूर्ण अनावृत । प्रकृति को रहस्य प्रिय है, शक्ति को रहस्य प्रिय है, स्त्री को रहस्य प्रिय है । रहस्य प्रिय था अर्धनारीश्वर को भी... तभी तो वे शिव हैं ।

शुकबाला शैय्या है और क्रीड़ा भी, वह रात्रि का अंधकार है और अन्धकार में चमकती चिंगारी भी, वह रात्रि का रहस्य है और दिन का श्मशान भी, वह भय है और आकर्षण भी, वह मृत्यु है और जीवन की अदम्य लालसा भी, वह प्रेम की उद्दाम लहर है और प्रतिशोध की पराकाष्ठा भी, वह पूर्ण मूक है और घोर मुखर भी, वह तृषाग्नि है और तृप्ति की शीतलता भी.... किंतु क्या इतनी ही! नहीं-नहीं... शुकबाला इतनी ही नहीं है... यह तो एक अंश भी नहीं है । तब... कितनी है शुकबाला ? क्या है शुकबाला ? मैंने सूत्रधार से पूछा तो उसने रहस्य को और भी घना करते हुये मुस्कराकर कहा – “कोन जाने बाबू ! तयँ पढ़े-लिखे हावे.. तयँ जान”। तब मैनें हरिवंश राय बच्चन की आत्मा को स्मरण किया । उन्होंने राह सुझायी, बोले – “राह पकड़ तू एक चला चल मिल जायेगी शुकबाला” ।          

और शुकबाला गंगासागर हो गयी

गंगा जी की यात्रा दीर्घ है... गोमुख से गंगासागर तक, किंतु गंगासागर की यात्रा ? 

हिमनद से द्रवित हो पर्वत की गोद से उछलती, किलकारी मारती, शिलाखण्डों के दर्प को चूर-चूर करती, हिमालय के रजकणों को मायके की धरोहर की तरह संजोती गंगा कहीं बलखाती-नृत्य करती है तो कहीं जैसे थक कर शांत होती और फिर उठकर चलती हुयी अपनी यात्रा पूरी करती है । किंतु गंगासागर में स्वयं को उड़ेल देने से पूर्व गंगा जी ने बंगाल में शुकबाला के कान में कोई मंत्र पढ़ा था । वह मंत्र आज भी शुकबाला के कानों में गूँजता है । यह वर्षा ऋतु थी जब गंगा जी ने शुकबाला के कानों में यह मंत्र पढ़ा था, शुकबाला तब तन्वी हो उठी थी । उसके कपोल रक्तिम हो उठे थे, वह रजस्वला गंगा जी को हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहती थी किंतु दोनों हाथ जुड़ने के स्थान पर फैल गये थे गोया वह गंगा जी को बाहों में भर लेना चाहती हो । शुकबाला की बाहें तब से आज तक खुली ही हुयी हैं... किसी को अपनी बाहों में भर लेने को आतुर ।

कई साल पूर्व बंगाल के एक छोटे से कस्बे के किनारे बहती गंगा ने एकदिन शुकबाला को गंगासागर बना दिया । संयोग की बात यह कि गंगा जी से अपनी प्रथम भेंट के समय वह भी गंगा जी की तरह रजस्वला हुयी थी... जैसे गंगोत्री में कुण्ड की अवमानना कर प्रथम बार क्षरित हो उछल कर बही हो गंगा । मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में रजस्वला हुयी थी शुकबाला । दादी मणिप्रभा की अनुभवी आँखों से कुछ छिप न पाया । उस दिन शुकबाला के घर स्त्रियों ने उत्सव मनाया और पुरुष चिंतित हुये ।

अब वह कन्या से किशोरी हो चुकी थी और एक दिन जबकि वह कामज्वर की तीव्र वेदना में छटपटा रही थी, अनायास आयी तीव्र आँधी ने उसे गंगासागर बना दिया था । गंगासागर बनते ही वह खारी हो उठी, आसपास के छिछोरों ने गीत गाये – “छोरी पटवारी की बड़ी नमकीन...” और “घेरदार घाघरा उठाय के चली लोहार की लली...” । किंतु शुकबाला की इस पीड़ा को कोई नहीं समझ सका कि वह अपने विस्तृत किनारों से कितनी घिर चुकी है । 

तब से शुकबाला समुद्र बन गयी है... जिसके भीतर हैं लावा उगलते न जाने कितने ज्वालामुखी । पिघला हुआ तप्त लावा समुद्र में समाता जाता रहा है और शुकबाला समुद्र की विशाल सीमा में बन्दिनी हो कर रह गयी है । गंगा बह सकती है, बह कर जा सकती है, किंतु समुद्र ! उसे तो अपनी सीमाओं में ही उछलना है, गिरना है, गरजना है, थकना है, शांत होना है... और फिर तप्त लावा के अंतः दबाव से उद्वेलित हो विस्फोटित हो जाना है ।

गंगासागर “गंगा” नहीं बन सकता, गंगा “गंगासागर” नहीं बन सकती । गंगा सा प्रवाह सागर कहाँ से लाये, और सागर के अंतस्तल में छिपा लावा उगलता ज्वालामुखी गंगा कहाँ से लाये ? हाँ ! नीर दोनों के नेत्रों में है... कहीं शीतल तो कहीं तप्त ।

आपने देखे हैं शुकबाला के अनमेनीफ़ेस्टेड आँसू ? जब वह श्मशान में भैरवी नृत्य करती है तब उसके खप्पर से रक्त बनकर टपकते हैं रंगहीन आँसू । देखना चाहते हैं तो अगली बार देख लीजियेगा ।

देखिये ! तनिक सावधानी से मेरे पीछे-पीछे आइयेगा

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शुकबाला को पहचानने में मुझसे कभी भूल नहीं होती, पिछली न जाने कितनी सदियों से देखता जो आ रहा हूँ उसे । आप भी देखना चाहते हैं तो आइये मेरे साथ ।

मैं आपको कंटीली झाड़ियों, धारदार पत्तों, उलझी हुयी लताओं, विषैले कीटों-मच्छरों और भयानक विषधरों से युक्त एवं सूर्य रश्मियों से वंचित घने जंगल के उस स्थान पर ले चल रहा हूँ जहाँ झरने के निर्मल जल में स्नान करती श्यामा सुन्दरी शुकबाला अघोर नृत्य में सुध-बुध खोकर तल्लीन है । उसका नृत्य भय और रोमांच के साथ अद्भुत् लास्य उत्पन्न कर रहा है । वादक दल में हैं वीणा बजाते झींगुर और हवा की वंशी बजाते वृक्षों के पत्ते । दर्शक हैं भालू, शुक, लंगूर और वन भैंसे ।

क्या कहा, मार्ग दुर्गम है ? हाँ ! सो तो है, घोर कष्टप्रद भी... वन्य पशुओं के हिंसक आक्रमणों की सम्भावनाओं, पेड़ पर लटकते अजगर के झपट्टे और कंटीली झाड़ियों से देह के बिंध जाने का संकट तो है ही... किंतु शुकबाला को देखने-जानने के लिये मेरे साथ यह दुर्गम यात्रा तो करनी ही होगी आपको ।

ओह ! सुकोमल हैं आप, कोई बात नहीं ! आप कोई संकट मोल नहीं लेना चाहते तो हम भी आपको बाध्य नहीं करेंगे । किंतु यदि शुकबाला को देखने की इतनी अदम्य इच्छा ने आपको बाध्य कर ही दिया है तो हम आपको कुछ साल पीछे ऋषिकेश ले चलते हैं जहाँ दस वर्ष की शुकबाला श्री गंगा जी के किनारे अपनी गीली हो गयी फ़्रॉक का थैला सा बनाकर छोटे-छोटे पत्थर चुन कर रखती जा रही है । जल प्रवाह से घिस-घिस कर आकृति ग्रहण कर चुके चिक्कण हुये गोल, अण्डाकार, शिवलिंग जैसे या आकृति ग्रहण करने की प्रक्रिया से गुज़रते हुये अनगढ़ पत्थरों पर बनी रंगीन रेखाओं में न जाने किन आकृतियों को खोजती नन्हीं शुकबाला मगन है । वह इतनी तल्लीन है पत्थर चुनने में कि वह यह भी नहीं जान सकी कि एक युवा साधु कितनी तृषित दृष्टि से पीता जा रहा है उसे, किंतु शुकबाला को इससे क्या, वह तो दुनिया से खोकर दुनिया में रमण जो कर रही है । 

यह बहुत पहले की बात है, तब शुकबाला को भी यह पता नहीं था कि एक दिन उसके चुने यही पत्थर कविता बन जायेंगे । पत्थर हैं तो कठोर होंगे ही... किंतु उन पत्थरों की आकृतियों और रंगीन धारियों से उभरे चित्रों के मोह को संवरण कर पाना शुकबाला के वश में तब भी नहीं था और आज भी नहीं है ।

आत्ममुग्धा श्यामा शुकबाला आज सर्वांग सुन्दरी है... किंतु उतनी ही रहस्यमयी भी जितनी कि प्रकृति स्वयं है । कभी वह कृष्ण-विवर बनकर ताण्डव नृत्य करती दिखायी देती है तो कभी तप्त लावा उगलती ज्वालामुखी । वह अनंत ब्रह्माण्ड के न जाने कितने रहस्यों को अपने में समेटे कभी विराट से विराट हो जाती है तो कभी गॉड पार्टिकल सी सूक्ष्म ।

श्री रामेश्वरम् की वह चाँदनी रात्रि

पूर्णमासी की निरभ्र रात्रि... हिन्द महासागर की उद्दाम लहरें श्री रामेश्वम् के शांत तट पर विकट रतिक्रीड़ा में लीन हैं । पास की एक उच्च शिला के शिखर पर भींगती खड़ी शुकबाला यह दृश्य देख-देख कर आन्दोलित हो रही है । काम की पास्सिव भूमिका में है शांत तट और एक्टिव भूमिका में हैं उद्दाम लहरें... आरोह-अवरोह की प्रचण्डता जैसे निगल जाने को आतुर हो चुकी है तट को । कामासक्त लहरों के थपेड़ों से उत्पन्न भयानक ध्वनि ने तट पर एक ओर खड़े महर्षि वाग्जित को अचम्भित कर दिया है ।

अद्भुत् दृश्य है... चाँदनी रात्रि में हिन्द महासागर की उद्दाम लहरें हैं, श्री रामेश्वरम् का शांत तट है, शिला शिखर पर खड़ी है सर्वांग सुन्दरी श्यामा शुकबाला... और इस सम्पूर्ण दृश्य को अचम्भित हो अपने नेत्रों में चिरतृषित की तरह भरते जा रहे हैं थोड़ी दूर पर खड़े विश्व के महान भौतिक शास्त्री महर्षि वाग्जित ।

जैसे-जैसे लहरें प्रचण्ड होती गयीं, शुकबाला भी प्रचण्ड होती गयी । तट शांत था, वाग्जित शांत थे । अचानक शुकबाला की दृष्टि दूर खड़े विचारमग्न महर्षि पर पड़ी । उस क्षण श्री रामेश्वरम् के तट ने विस्मित हो देखा... देखा कि चाँद और भी मुस्करा उठा है और सर्वांग सुन्दरी शिला से कूद कर भागी चली जा रही है । श्री रामेश्वरम् की रेत ने उसे रोकना चाहा किंतु रोक न सकी । शुकबाला महर्षि से जाकर लिपट गयी... फिर हाथ पकड़ कर खींच ले गयी तट के उस छोर पर जहाँ लहरें घोर रतिक्रीड़ा में लीन थीं । श्वासों के थपेड़ों से गतिमान हुये शुकबाला के वक्ष के आरोह-अवरोह ने महर्षि का ध्यान अपनी ओर खींचा ही था कि अपने दोनों हाथ फैला कर शुकबाला बोल उठी – “सृष्टि का आमंत्रण, महर्षि वाग्जित! आज आपको यह आमंत्रण स्वीकार करना ही होगा”।

ब्रह्म बेला में जब श्री रामेश्वरम् के मन्दिरों में घण्टियाँ बजने लगीं और शंख ध्वनि होने लगी तो क्षितिज से झाँकते हुये सूरज ने लहरों और शुकबाला दोनों को एक साथ थपकी दी ।

सूर्य की प्रथम् किरण के आलोक में वाग्जित ने देखा – श्री रामेश्वरम् के तट पर जलचर मांसाहारी पक्षी मँडराने लगे थे और अपने प्राणों की रक्षा में इधर-उधर भागते मटमैले रंग के केकड़े एक-एक कर उनके निवाले बनते जा रहे थे । अंग-अंग टूट चुकी शुकबाला ने उन्मीलित नेत्रों से देखा... उद्दाम लहरों को तटस्थ दक्षिणी ध्रुव जैसे अपनी ओर खींच रहा था । शुकबाला ने भी पूर्व का रुख किया... जहाँ प्रभात का प्रभास श्री रामेश्वरम् नगर को अपने अंक में भर लेने को आतुर हो रहा था । वाग्जित पथिक भाव से वीतरागी हो पहले ही बहुत आगे निकल चुके थे ।

कारला और तीस्ता के संगम पर

प्रकृति की लीला! वे डाईज़ाइगोटिक युग्म थे । एक के मीज़ोनेफ़्रोज़ की अपर लेयर जब शुकबाला के लिये म्यूलेरियन डक्ट की सृष्टि कर रही थी ठीक उसी समय दूसरे जाइगोट के मीज़ोनेफ़्रोज़ ने करवटी ली और विमलेन्दु के लिये प्राइमिटिव गोनेड का सृजन प्रारम्भ कर दिया ।  नौ माह बीस दिन बाद दो रचनाओं ने माँ के गर्भ से बाहर आकर अपने आने का समाचार सुनाया । ये दो रचनायें थीं विमलेन्दु और शुकबाला ।

चौदह वर्ष की आयु में एक दिन विमलेन्दु ने घर त्याग दिया । उड़ते-उड़ते समाचार सुना गया कि विमलेन्दु को तीस्ता और कारला के संगम पर देखा गया है । पिता जब तक वहाँ पहुँचते तब तक विमलेन्दु वहाँ से कहीं और चला गया । बाद में उसे दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर में देखा गया । भाई के साधु बन जाने पर शुकबाला को विचित्र सी अनुभूति हुयी । उसका मन उस स्थान के दर्शन के लिये मचलने लगा जहाँ कारला और तीस्ता का संगम होता है । पोखर किनारे एकांत में बैठकर वह अक्सर सोचा करती विमलेन्दु मुझसे दूर हो गया... वहाँ... जहाँ मिलती हैं कारला और तीस्ता । मन की आँकों से कारला और तीस्ता को देखते हुये उसने अपने जन्म को स्मरण किया, कभी माँ के उदर में देह के दो खण्ड पृथक हुये तो यहाँ दो नदियों की जलधारायें आपस में मिल कर एकरूप हो रही हैं ।

एक दिन बिना किसी को कुछ बताये शुकबाला ने भी कालीमन्दिर की राह पकड़ ली । दादी मणिप्रभा का रो-रो कर बुरा हाल हो गया । धींगड़ी को खोजें भी तो कहाँ ? और जब तक पिता पता लगाते-लगाते कालीमन्दिर पहुँच पाते एक भयानक आँधी ने शुकबाला के जीवन की राह ही बदल कर रख दी ।

एकाकी किशोरी को भटकती पा कर एक प्रवंचक साधु ने उसे विमलेन्दु के पास पहुँचा देने का विश्वास दिलाकर अपने साथ ले लिया... और फिर जो नहीं होना था वह सब हुआ । तब तीव्र वेदना के बीच विचित्र अनुभूतियों से साक्षात्कार हुआ शुकबाला का ।

शुकबाला किसी तरह अकेली ही पहुँची कालीमन्दिर । तब तक सहोदर वहाँ से भी प्रस्थान कर चुका था । रमता जोगी बहता पानी कब कहाँ ठहरा है भला ! 

ढोंगी साधु की गाँजे की गन्ध से भरी साँसों को किस तरह झेला था शुकबाला ने यह वही जानती है । साधु के प्रचण्ड आवेग से हुये क्षतों से घायल शुकबाला अब उग्र सिंहनी बन चुकी थी ।

उफनती जलढाका तो पार हो गयी डोंगी से, क्या इसी तरह भवसागर भी पार कर सकूँगी – डोंगी से उतरते समय सोच रही थी शुकबाला ।

कहाँ से मिलेगी भवसागर पार कराने वाली डोंग़ी? रामकृष्ण होते तो पूछती, माँ होतीं तो पूछती, किससे पूछूँ ? माँझी से ही पूछ बैठी, - बताओ तो दादा! भवसागर पार कराने वाली डोंगी कहाँ मिलेगी? माँझी कुछ न बोला, उंगली से संकेत भर किया एक ओर, शुकबाला ने संकेत वाली दिशा में देखा, नाग-नागिन का जोड़ा, परस्पर लिपट कर खेलता हुआ । विषधर की प्रणय लीला । शुकबाला मुग्ध हो देखती रही, देखती रही ...और फिर खो गयी कहीं । अब वहाँ नाग-नागिन के स्थान पर थे चक्र में घूमते हुये यिन और यांग, थिरकते हुये फ़ोटॉन्स, ब्राउनियन मूवमेंट, न्यूक्लियस को आराध्य मान नृत्य करते इलेक्ट्रॉन्स, और... स्थूल ब्रह्माण्ड में घूमते विशालकाय पिण्ड । शुकबाला यात्रा करने लगी, स्थूल और सूक्ष्म के मध्य । अद्भुत् थी यह यात्रा, नृत्य और काम से परिपूर्ण ! सोचने लगी शुकबाला, सृष्टि के लिये अनिवार्य हैं ये तत्व, फिर इतनी वर्जना क्यों ? काम को लेकर इतना हाय-हल्ला क्यों ? तभी देखा शुकबाला ने, नाग-नागिन का जोड़ा दूर होता जा रहा था खेलते-खेलते, और छिप गया झाड़ियों की ओट में... देखते ही देखते । शुकबाला को जैसे समाधान मिल गया हो, वह पलटी, और डोंगी में बैठती हुयी माँझी से बोली – “चलो वापस! मुझे घर जाना है” ।

शुकबाला की आँखों में अद्भुत् है वर्जनाओं का आकर्षण ! वर्जनायें किसे नहीं खीचतीं! कितने हैं भीड़ में, जो कर पाते मोह संवरण– वर्जनाओं को छिप-छिप कर देख पाने का, अपशब्द कहने वालों की भर्त्सना में अपशब्द कहने का, नग्नता का विरोध करने से पूर्व नग्नता को जी भर पी लेने का ? उसी हिमनद से पिघलकर निकलती है वर्जना, जिसमें से निकलती है तृष्णा । दोनों को पृथक करना है तो बनना होगा योगी । भोगी तो बहुत हैं – तृष्णा के... वर्जना के... और उस दमन की प्रतिक्रिया के भी जो उत्पन्न होती है वर्जनाओं के दमन से ।

बहुत सरल होता है विरोध करना, बहुत कठिन होता है विरोध को सरल बनाना । बहुत सरल होता है वर्जना को इंगित करना, बहुत कठिन होता है किसी वर्जना को जी पाना । यूँ ही, इतना बड़ा नहीं हो गया पोर्न का बाजार, सफ़ेदी पुते घरों में अँधेरों का व्यापार । बहुत क्षीण और कोमल होती है नैतिकता और अनैतिकता की विभाजक रेखा । दुरदुराना तनिक भी मुश्किल नहीं होता, किंतु बहुत मुश्किल होता है शुकबाला की आँखों में भीतर तक झाँक पाना । जो बताते नहीं थकता है देहव्यापार को किसी सभ्य समाज का कैंसर…कोठे से निकलते देखा है रात के अँधेरे में सबने उसे । कहा था शुकबाला ने एक दिन – मुखौटे ओढ़ने में दमड़ी नहीं लगती ।

यह भीड़ जो तमाशबीन है, बजाती है तालियाँ, साथ नहीं होती कभी किसी बाजीगर के, उसे तो अकेले ही जीनी होती है अपनी ज़िन्दगी... किसी सीलन भरी अँधेरी कोठरी में । खिसकने लगते हैं लोग, जैसे ही उठाता है कटोरा, नन्हा सा जमूरा, अभी-अभी जिसके ज़िस्म के दो टुकड़े कर दिये थे बाज़ीगर ने । कितना वीभत्स था वह दृश्य... रक्त से सनी देह, किंतु इसी को तो देखने जुटती है भीड़, बजाती है तालियाँ... करती है वाह-वाह! किंतु इस भीड़ में, कोई नहीं सुन पाया आज तक, नन्हें जमूरे की आह । और सुनो ! शुकबाला का कटोरा भरा नहीं है आज तक !

आत्महत्या से पूर्व, अपने दुधमुहे को विष पिला दिया, श्यामा सुन्दरी ने । तुम उसे हत्या कहते हो, मैं उसे प्रेम की पराकाष्ठा कहता हूँ । तुम उसे क्रूरता कहते हो, मैं उसे असुरक्षित प्रेम की विवश परिणति कहता हूँ । जब भर्त्सना कर रही थी भीड़, गालियाँ दे रही थी श्यामा सुन्दरी को, तब पछाड़ खा-खा कर विलाप कर रही थी… दुधमुहे के शव को देख-देख... मृत श्यामा सुन्दरी की आत्मा ।

जानते हो! ऑक्टोपस होती हैं प्रेम की प्रवंचनायें, बन जाती हैं प्रतिशोध, जला कर भस्म कर देती हैं सब कुछ, रह जाता है अग्नितप्त कंचन सा निर्मल प्रेम । यह बात बतायी थी मुझे अमावस की रात ने, जब हो गया था ख़ून पूनो के चाँद का । प्रतिपदा की रात चुपके से झाँका था चन्दा, पुनर्जन्म हुआ था उसका, झुकाकर पलकें... करता रहा था प्रायश्चित । उस रात ओस बहुत गिरी थी और पूरी तरह भीग गयी थी शुकबाला ।

सबने कहा – नग्नता में रहती है अश्लीलता! मैंने खोजा उसे... बस्तर की नग्न देहों में... बहुत खोजा उसे, पर मिली नहीं कहीं । फिर मिल गयी एक दिन भरपूर अश्लीलता... उसके पास, जिसकी देह नहीं थी नग्न । शुकबाला तो यूँ ही बदनाम हो गयी ।

धूपगुड़ी की गली

भाद्रपद का कृष्णपक्ष ! रात के आठ ही बजे हैं लेकिन लगता है जैसे रात गहरा गयी है ! दो दिन से लगातार झमाझम बरसते काले मेघ जैसे प्रतिशोध पर उतारू थे । चर्चा थी कि, बंगाल की खाड़ी में चक्रवात आया है । धूपगुड़ी की गली-गली जैसे पद्मा हो चली, शुकबाला ने इससे पहले धूपगुड़ी की गलियों को कभी पद्मा-पद्मा होते नहीं देखा था । तिखण्डे पर अपने कमरे में लेटी मणिप्रभा ने शुकबाला से खिड़कियाँ बन्द कर देने को कहा । शुकबाला ने एक... दो...तीन खिड़कियाँ बन्द कर दीं किंतु जब चौथी खिड़की बन्द करने लगी तो उसके हाथ रुक गये । तेज हवा के साथ पानी की एक बौछार का कुछ अंश उसके चेहरे को भिगो कर फ़र्श पर बिखर गया । शुकबाला ने आकाश की ओर देखा – वर्षा रुकने के कहीं कोई संकेत नहीं । फिर नीचे झाँक कर नदी बन चुकी गली की ओर देखा, कोलाहल करती हहराती जलराशि, जैसे सब कुछ बहा ले जाने को आतुर हो अपने साथ । उसे किंचित सिहरन सी हुयी किंतु अगले ही पल प्रकृति की इस विनाशलीला को देख उसे रोमांच सा होने लगा । तभी नीचे से किसी ने पुकारा, “दीदीमोनी ! खोलिये, बस्तर से कोई बाबू मोशाय आये हैं”।

बस्तर से बाबू मोशाय ? वह भी इतनी वर्षा में ? कौन है यह ? – शुकबाला ने मन ही मन सोचा । सीढ़ियाँ उतरते समय वह कौतूहल से भर उठी, कौन है यह बाबू मोशाय ?  

द्वार खोलते ही शुकबाला का हृदय जैसे उस अपरिचित के लिये ममत्व से भर उठा । बोली, “ओह ! आप तो पूरी तरह भीग गये हैं, जल्दी से भीतर आ जाइये”।

पोर-पोर पानी टपकाते बाबू मोशाय को बहुत संकोच हुआ, बोले – “आपका घर गीला हो जायेगा, मैं पूरी तरह भीग चुका हूँ, मेरा सामान भी...”

शुकबाला हँसी, बात काटकर बोली, - “इस वारिश में कोई भीगे बिना बच सकता है, यह आपने सोचा भी कैसे ! आप संकोच मत कीजिये, जल्दी से अन्दर आकर कपड़े बदल लीजिये, नहीं तो सर्दी लग जायेगी । आइये-आइये, विलम्ब मत कीजिये”।

दोनों ऊपर पहुँचे तो मणिप्रभा ने पूछा – “कौन आया है धिये ?”

शुकबाला क्या कहती ! हँसकर बोली – “अतिथि हैं दादी ! हिंदी बोलते हैं, दूर से आये हैं”।

शुकबाला ने गुसलखाने की ओर संकेत करते हुये बाबू मोशाय से कहा – “आप कपड़े बदल लीजिये, तब तक मैं आपके लिये चाय बनाती हूँ”।

किसी अपरिचित के प्रति शुकबाला की इस आत्मीयता से बाबू मोशाय आत्मविभोर हो उठे । सोचने लगे, फ़ेसबुक की वर्चुअल चौपाल के लोग इस शुकबाला को कैसे जान पायेंगे भला !

शुकबाला उधर चाय बना चुकी थी और इधर बाबू मोशाय ने कपड़े बदल लिये थे । दोनों ने एक साथ कमरे में प्रवेश किया । चाय रखते ही बोली शुकबाला – “आप अपने सामान की चिंता मत कीजिये, मुझे दीजिये, सब सुखा दूँगी”।

बाबू मोशाय ने संकोच किया तो शुकबाला हँसकर बोली – “अपना पैसा कौड़ी निकाल लीजिये और बाकी सामान दे दीजिये मुझे”।

बाबू मोशाय और भी संकुचित हो गये, बोले – “नहीं-नहीं ...वैसी कोई बात नहीं । मैं तो यह सोच रहा हूँ कि मेरे कारण आपको कितना कष्ट उठाना पड़ रहा है । मुझे भादौं में लगातार इतनी वर्षा की आशा नहीं थी, सोचा था आपसे मिलकर तुरंत वापस चल दूँगा । लेकिन ट्रेन ही इतनी लेट हो गयी कि यहाँ आते-आते रात हो गयी”।

बाबू मोशाय ने अपने तर-ब-तर सामान की ओर संकेत कर कहा – “अब इसका जो करना है आप ही कीजिये”।

शुकबाला ने कहा – “चलिये, पहले चाय पी लेते हैं । यूँ हम बंगाली लोग आपकी तरह चाय नहीं पिया करते, खाया करते हैं”।

बाबू मोशाय हँस पड़े । इतनी देर बाद संकोच की दीवारें ढहनी शुरू हुयीं और वातावरण कुछ सामान्य हुआ ।

चाय पीते-पीते हँसकर पूछा शुकबाला ने –“तो कहाँ से चली थी आपकी ट्रेन जो इतनी लेट हो गयी”?

बाबू मोशाय ने पहले तो अपना परिचय दिया फिर पूरा किस्सा सुनाया कि वे जगदलपुर से वाल्टेयर होते हुये किस तरह और क्यों यहाँ तक आ पहुँचे ।

शुकबाला मुस्कराती हुयी उठी और बाबू मोशाय का तर-ब-तर सामान उठाकर अन्दर चली गयी । थोड़ी देर में वापस आते ही खिलखिलाकर हँस पड़ी शुकबाला । अतिथि उसे देखता ही रह गया, मन में सोचा- कितनी हँसती है यह लड़की! क्या सचमुच यही है वो शुकबाला जिसकी तलाश में यहाँ तक आ पहुँचा है वह ...अपनी विवादास्पद कविताओं के लिये कुख्यात हो चुकी दोपदी सिंघार उर्फ़ शुकबाला या फिर कोई और है यह ? अतिथि ने पूछा – “आप हँस क्यों रही हैं ? कुछ अस्वाभाविक हुआ क्या”?

“अस्वाभाविक....” –कहने लगी शुकबाला –“कोई इतना भी दीवाना होता है क्या? आप डॉक्टर हैं और किसी अनजान लड़की की उलझी-उलझी कविताओं के पीछे-पीछे यहाँ तक चले आये... और वह भी इतने वर्षाकाल में?”

बाबू मोशाय को लगा, सचमुच अस्वाभाविक तो है ही, ऐसा भी कहीं होता है भला ! कविताओं के लिये ऐसी दीवानगी! कि बस्तर से जलपायीगुड़ी तक आ पहुँचे!

अतिथि को गम्भीर देखकर बोली शुकबाला – “अरे ! आप तो गम्भीर हो गये ! मैं तो बस यूँ ही कह रही थी । सच बताऊँ... मैं अभिभूत हूँ । निन्दा के सिवाय मुझे मिला ही क्या है अभी तक... और एक आप हैं जो शुकबाला को खोजते हुये भींगते-भागते यहाँ तक आ पहुँचे । सच तो यह है कि मेरे पास शब्द नहीं हैं कुछ कहने के लिये ....यह जो मैं इतना बके जा रही हूँ यह तो बस छलावा है, यह शेखी बघारने के लिये कि मैं शब्दहीन नहीं हूँ” ।

शुकबाला ने देखा, बाबू मोशाय का पूरा शरीर थर-थर काँप उठा था, आँखें भारी होकर झुकने सी लगी थीं । वह उठी और पास आकर खड़ी हो गयी, बोली- “आप ठीक तो हैं न बाबू मोशाय”?

अतिथि को चुप देखकर शुकबाला ने उसके माथे को स्पर्श किया फिर किंचित परेशान होकर बोली –“तीव्र ज्वर हो गया है आपको तो । आप लेटिये, मैं त्रिकटु और गुडुच्यादि चूर्ण का काढ़ा बना कर लाती हूँ”।

वायरल फ़ीवर से मुक्त होने में अतिथि डॉक्टर को समय लग गया । शुकबाला के घर में रहते हुये उसका आज नौंवा दिन था । इस बीच शुकबाला की विवादास्पद पेटीकोट कविताओं को लेकर दोनों में कोई बात नहीं हुयी । शुकबाला ने जिस आत्मीय भाव से उसकी सुश्रुषा की उससे वह स्वयं को शुकबाला का ऋणी मान चुका था । नौंवे दिन उसने कहा – “अब मैं ठीक हूँ, और जा सकता हूँ । बस एक उपकार और कर दीजिये, कल की यात्रा के लिये मेरा आरक्षण करवा दीजिये”।

शुकबाला ने उलहना सा दिया, कहा – “अभी तो आपके आने का उद्देश्य ही पूरा नहीं हुआ, ऐसे कैसे चले जायेंगे”?

अतिथि, जो अब तक आत्मीय सा हो गया था, मुस्कराते हुये बोला – “इतने दिन में उद्देश्य पूरा नहीं हुआ तो और कब पूरा होगा ! मुझे जो जानना था, वह इतने दिनों में देख कर जान चुका हूँ ...अब और क्या शेष है !”

सर्वांग सुन्दरी श्यामा शुकबाला उर्फ़ दोपदी सिंघार ठुमक कर बोली – “क्या जान लिया है, बाबू मोशाय! भला मैं भी तो जानूँ ! कैसी है शुकबाला!”

बाबू मोशाय ने कहा – “मेरे लिये गूँगे का गुड़”।

मुस्कराती हुयी शुकबाला बोली – “तब तो आप भी फ़ँस गये वामपंथी जादू में”।

बाबू मोशाय बोले – “वामपंथ का इतना विरोधी भी नहीं हूँ मैं, किंतु पेटीकोट वाली कविता बस्तर का कटु सत्य होते हुये भी अभिव्यक्ति की सारी सीमाओं को विदीर्ण करती सी लगी थी मुझे भी”।

शुकबाला बोली – “भोगे हुये कटु सत्य का वर्णन मधुर कैसे हो सकता है ? समाज के सभ्य लोग तो बहुत पहले ही सभ्यता की सारी सीमाओं को तार-तार कर चुके होते हैं । मेरी कविताओं ने तो उसके बाद ही जन्म लिया है न! रही बात अभिव्यक्ति की शालीनता की तो ऐसी घटनाओं के बाद अदालतों में आपके सभ्य वकील कितने शालीन होते हैं?”

बाबू मोशाय निरुत्तर हो गये । तभी ड्रायवर ने पास आकर कहा – “समय हो गया है बाबू मोशाय!”

विदायी के समय मणिप्रभा ने बाबू मोशाय को यशस्वी होने का आशीष दिया । दरवाजे के पल्लू से सट कर खड़ी श्यामा सुन्दरी के चेहरे पर जैसे मेघ घिर आये, पूछा– “फिर कब आओगे अतिथि”?

अतिथि ने कुछ कहना तो चाहा पर शुकबाला की ओर एक बार दृष्टिपात कर सकने का भी साहस नहीं कर सका ।

शुकबाला कभी नहीं मरती 

सोचा था कि “धूपगुड़ी की गली” के बाद यह अध्याय बन्द हो जायेगा किंतु सोचा हुआ कब पूरा होता है भला! वह अध्याय फिर एक दिन खोलना पड़ेगा, इसका लेश भी अनुमान नहीं था मुझे । वह कथा शुकबाला कोथा की इति नहीं हो सकी और मुझे विवश होकर एक बार फिर धूपगुड़ी जाना पड़ा । इस बार जब मैं उससे मिलने गया तो वहाँ वह अकेली नहीं थी, उसके साथ थी दोपदी सिंघार और अम्बर रंजना पाण्डेय भी । मुझे अच्छा लगा कि तीनों से एक साथ भेंट हो रही थी । इस अद्भुत् भेंट के बारे में बताने से पहले एक और बात बतानी आवश्यक है ।

दर-असल हुआ यह कि चेहरे की चौपाल पर जमे विद्वानों ने एक दिन सुना कि तोताबाला मर गयी । किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई तीन–चार दिन पहले से यूँ घोषणा करके मर सकता है । किंतु समाचार तो यही यही था कि दोपदी सिंघार की मृत्यु के बाद अब तोताबाला ठाकुर की भी मृत्यु हो चुकी थी । अंतर यही था कि दोपदी की मृत्यु अघोषित थी जबकि तोताबाला की मृत्यु पूर्व घोषित थी । किंतु मेरे जैसे ढीठ जिसके पीछे पड़ जायँ उसे तो उस लोक जाकर भी वापस आना ही पड़ता है, सो तोताबाला उर्फ़ शुकबाला और दोपदी सिंघार को भी आना ही पड़ा ।

धूपगुड़ी के उस तीन तल्ले वाले मकान में अम्बर को देखा तो मन हुआ कि अम्बर से पूछूँ क्या शुकबाला अपनी पूरी उम्र जी चुकी थी ? फिर सोचा, पहले शुकबाला से ही बात करूँगा, अम्बर की अपेक्षा वह कहीं अधिक परिचित है ।

मैंने मुस्कराते हुये शुकबाला की ओर देखा फिर अकबर वाला डायलॉग उलट कर सलीम की ओर से मारा – “अनारकली ! हम जानते हैं... अकबर तुझे जीने नहीं देगा... और हम तुझे मरने नहीं देंगे”।

डायलॉग सुनकर अम्बर मुस्कराये, बोले कुछ नहीं । मैं ही पुनः बोला – “अम्बर ! यदि तुम सोचते हो कि दोपदी और शुकबाला अब सदा के लिये मंच से जा चुकी हैं तो तुम बहुत बड़े धोखे में हो । वे दोनों कभी नहीं मर सकतीं, किंतु आज मैं केवल शुकबाला से ही मिलना चाहता हूँ... दोपदी से नहीं”।

अम्बर ने अपनी भृकुटि को सायास उठाया गोया मंच से यवनिका उठा रहे हों, माथे की सलवटें घनी हो गयीं और उनकी दृष्टि मेरे चेहरे से चिपक गयी ।

मैंने कहा – “मैं तुम्हारी दोपदी से तो कभी प्रेम कर ही नहीं सका किंतु इस अप्रेम की स्थिति में भी उसके अवाँछित अस्तित्व को नकार नहीं सकता । अब बात आती है शुकबाला की... क्या तुम समझते हो कि उसके साथ कुछ दिन खेल खेलकर जी भर जाने पर उसकी हत्या करके उसके अस्तित्व को समाप्त किया जा सकना सम्भव है”?

अम्बर ने शुकबाला को आँख से संकेत कर भीतर जाने का हुक्म दिया फिर बोले – “दोपदी की तरह शुकबाला का भी संवाद पूरा हुआ, यहाँ अब उसकी कोई आवश्यकता नहीं । रंगमंच पर कोई स्थायी नहीं टिका रह सकता । हमें अभी आगे भी जाना है, हम एक ही स्थान पर कैसे ठहर सकते हैं”?

मैंने कहा – “नहीं... तुम किसी भी पात्र के साथ मनमानी नहीं कर सकते । तुम्हें फिर से परकाया प्रवेश करना होगा । तुमने देखा नहीं कि किस तरह शुकबाला की क्षत-विक्षत लाश को मांसभक्षी गिद्ध नोच-नोच कर खा रहे हैं । न जाने कितने लोगों को शुकबाला से बेपनाह मोहब्बत हो गयी थी... न जाने कितने दीवाने उससे ब्याह कर उस प्रचण्ड समागम की दुर्दांत अनुभूति के लिये लालायित हो उठे थे... न जाने कितने लोग ताण्डवनृत्य के साथ जघन्य हत्यायों की लोमहर्षक घटनायें अपनी आँखों के सामने घटित होती हुयी देखने के स्वप्न देखने लगे थे, और तुमने अचानक इस कोटि-कोटि जनसमुदाय के स्वच्छन्द स्वप्नों पर तुषारापात् कर दिया ! नहीं अम्बर ! यह तो कतई उचित नहीं हुआ, तुम्हें एक बार फिर परकाया प्रवेश करना ही होगा”।

अम्बर कुछ दबाव में आते से दिखे, बोले – “देखिये! मेरा शिड्यूल बहुत टाइट है, मेरा कार्यक्रम पूर्व निर्धारित है, अभी मुझे परकाया प्रवेश के लिये फ़िलिस्तीन जाना है... और फिर एक ही पात्र में मैं बारम्बार परकाया प्रवेश नहीं कर सकता । यदि आप लोगों को यह इतना ही आवश्यक लगता है तो चौपाल में शुकबाला के बेशुमार दीवानों में से ही किसी को अब यह काम करना होगा”।

कुछ क्षण चुप रहकर अम्बर ने अपनी बात का उपसंहार करते हुये कहा – “ऐसा करता हूँ... मैं शुकबाला की आत्मा को जे.एन.यू. के मुख्य द्वार पर बेताल की तरह रहने के लिये कहे देता हूँ । शुकबाला के प्रेमी जब चाहें वहाँ जाकर उससे मिल सकते हैं । फ़िलिस्तीन जाने के लिये मेरी फ़्लाइट का समय हो रहा है... मैं चलता हूँ”। अम्बर उठे और घर से बाहर निकल गये । मैंने शुकबाला को आवाज़ दी तो वह चुपचाप भीतर से निकलकर मेरे सामने बेजान सी आकर खड़ी हो गयी । मैंने पूछा – “मुझे पहचाना शुकबाला? मैं हूँ डॉक्टर कौशलेंद्र... वहाँ चेहरे की चौपाल पर पड़ी तुम्हारी क्षत-विक्षत लाश को देखकर मुझसे रहा नहीं गया । मैं उन नौ दिनों को कैसे भूल सकता हूँ जब ज्वर में तपते हुये एक अपरिचित की तुमने इतनी आत्मीयता से सेवा की थी । मैं तुम्हारा चिर ऋणी हूँ”। 

बहुत धीमी आवाज़ में शुकबाला ने कहा – “ऐसा मत कहिये... आपके यहाँ आने का उद्देश्य ही मेरी इस अंतिम यात्रा का पाथेय बन गया है । मुझे अम्बर से कोई शिकायत नहीं है... उन लोगों से भी नहीं है जो चौपाल पर मेरी निन्दा करते नहीं अघाते । शिकायत तो मुझे उन गिद्धों से भी नहीं है जो चौपाल पर पड़ी मेरी लाश को नोच-नोच कर खा रहे हैं... बल्कि ख़ुशी है मुझे... कि मर कर ही सही... मैं कुछ लोगों के काम तो आ रही हूँ”।

जिस चौखट से एक बार अपने भरे नयनों से शुकबाला ने विदा दी थी मुझे उसी चौखट पर खड़े होकर चाहकर भी शुकबाला के लिये कुछ कर पाने में असमर्थ हो गया था मैं । अपने रुंधे कण्ठ से इतना ही बोल सका – “शुकबाला ! तुम कभी नहीं मर सकतीं...”

शुकबाला कुछ नहीं बोली, मेरी ओर देखकर केवल मुस्करायी भर... । उसकी मुस्कराहट में छिपा दुःख का अथाह सागर मेरी दृष्टि से छिपा नहीं रह सका । तभी आँखों से बगावत कर खारे पानी की कुछ बूँदें निकलकर उस अथाह सागर से जा मिलीं । ये नामुराद आँसू बात ही कब मानते हैं मेरी ।