सुकून की तलाश में, 

बस भागे जा रहे हैं हम, 

मिल तो रहे है राह में, 

पर फिर भी क्यों ये लग रहे हैं कम, 

फिर वो सुकून नहीं, 

शायद है वो हमारा ही भ्रम, 

या फिर शायद परख ही नहीं पा रहे हम, 

वक़्त तो है की रुकता ही नहीं, 

और ना ही ठहर रहे हैं हम, 

बस यूँ ही एक दिन ये वक़्त भी गुजर जायेगा, 

हम भी कहाँ रहेंगें तब, 

फिर ना ये तलाश होगी, 

और ना होगी ये तलब, 

फिर ये समझ भी कहाँ होगी, 

की जिसे ढूँढ रहे थे हम, 

वो तो साथ ही था हर कदम, 

फिर समझ कर भी क्या ही कर लेंगें हम, 

की किस सुकून की तलाश में, 

क्यों ही भागे जा रहे थे हम, 

अब वक़्त तो रहा ही नहीं, 

तो सुकून ले कर भी क्या ही कर लेंगें हम......