वक़्त की बाँहें's image
Love PoetryPoetry1 min read

वक़्त की बाँहें

kaushal kumar joshikaushal kumar joshi January 30, 2023
Share0 Bookmarks 59436 Reads6 Likes

ना जाने वक़्त की बाँहें कितनी बड़ी हैं,

जब भी छू के निकलता है, सब समेट ले जाता है


वो सारे लम्हे, वो सब नज़ारे,

जिनकी मुझको, तुमको, सबको ज़रूरत है,

कुछ अधूरे ख़्वाब कामिल करने हैं,

कुछ ग़लतियाँ सुलझानी हैं,

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts