न पूरी आजाद हूं मैं न पूरी कैद हू मैं

जाने ये कौन से बँधन से जकड़ी हूँ मैं

हाथ थामा भी है पर पूरा छोड़ा भी नही

उनके पास रह कर भी सुकून न है तो

उनसे दूर रहकर फिर क्यों चैन नही

क्यों उन्हें छोड़ना मेरे बस का नही

क्यों उनसे जुड़ना मेरे बस का नही

ये कैसी जंजीर से सब बांधे है मुझको

क्यों इस बंधन को तोड़ना मेरे बस का नही

-करुणा