एक दाना अंकुर बन,
नीव वृक्ष की रखता है।
सूक्ष्म आकार रख,
दीर्घता को बुनता है।
दो कोमल पत्ते से ही,
फूल मन में खिलता है।
नन्हा सा पौधा बन वह ,
उम्मीद की किरण बनता है।
धीरे-धीरे जड़े धरा में जो,
धस्ती जाती है।
उसी गति से तने आकाश को,
छूने को लालायित हो जाती है।
पूर्ण, समृद्ध पेड़ बन,
उदारता का उदाहरण बन।
समर्पण का सीख ले,
अडिग, अचल बन।
सुख के आखिर दिन कितने बचते हैं
पतझड़ में पत्ते झड़ते हैं।
उम्मीद का किरण नहीं जाता
हर जेठ के बाद सावन है आता।
फूल–फल सब, सबको देता।
‘कार्तिक’ मूर्ख भला जहां को,
कौन है इतना देता।
