लाख चौरासी योनि में जो ,

जीव भटकता रहता है ।

सतगुरु सच्चा पाकर वह ,

जीवन तट से तर जाता है ।


निंदा , नफरत , द्वेष सभी‌ ,

जीवन पथ से भरमाता है ।

मिले जो पूर्ण सतगुरु जन को ,

तो मुक्ति पथ को पाता है ।


ज्ञान गुरु का यह है सच्चा ,

जो पाकर अपनाता है ।

"कार्तिक" जीव जीवन पथ से ,

तुरंत मुक्त हो जाता है ।