लिखता हूं,

मैं शब्द तुम्हारे।


जो आंखों से,

मोती बनकर,

झर जाते हैं।


चुन चुन कर,

उन्हें कागज़ पर,

रखता जाता हूं,

फिर भी,

उनमें से कुछ,

गिरकर, मर जाते हैं।।


बचे हुए शब्दों से,

बुन कर स्वप्न तुम्हारे,

यूं ही अक्सर,

लिखता हूं,

मैं शब्द तुम्हारे।।


शब्दों के तानेबाने,

जाने पहचाने,

कुछ तुम तक तो,

पहुंच चुके,

कुछ हैं अनजाने।।


अनजाने रस्तों के,

सब गंतव्य तुम्हारे,

यूं ही अक्सर,

लिखता हूं,

मैं शब्द तुम्हारे।।


शब्दों के अंतरमन,

के सब जंतर मंतर,

मिलते जैसे,

रेवा के कण कण,

में शंकर।।


मेरे अंतरमन के,

सब प्रारब्ध तुम्हारे,

यूं ही अक्सर,

लिखता हूं,

मैं शब्द तुम्हारे।।


जो आंखों से,

मोती बनकर,

झर जाते हैं।

यूं ही अक्सर,

लिखता हूं,

मैं शब्द तुम्हारे।।


~कर्मेंद्र