कुछ तम्मनाओं को,
इस तरह से गढ़ें फिर से।
किसी शज़र पे,
एक बार तो चढ़ें फिर से।।
बहुत रुसवाईयाँ, बड़ी बेरूख़ी,
उजाड़ सूनापन।
चलो यारों से मिलें,
और फिर, लड़ें फिर से।।
देखता मैं हसरतों से,
बच्चों के खिलौनों को।
चलो बचपन में चलें,
और ना बढ़ें फिर से।।
~ कर्मेंद्र
