वो समझता ही नहीं, इश्क की गहराई को,
मैं उसे दिल में, उतारूँ तो उतारूँ कैसे ।।
ख्वाहिशों में भी जिसे, बारिशों की चाह नहीं,
घटा कहके, घनेरी जुल्फ सवारूँ कैसे ।।
संवारता है मेरे शहर को, तहे दिल से कोई,
संग दिल बन के, वो शहर उजाड़ूं कैसे ।।
सियासी खेल है, उजाड़ के बनाता है शहर,
मैं उसका खेल, बिगाड़ू तो बिगाड़ू कैसे ।।
वो कहता है, मुझ पर भी लिखो नज़्म कोई,
मिला है कल ही, अल्फाज़ में ढालू कैसे ।।
- कर्मेंद्र
