निगाहे यार से बचती सम्हलती आँखें।
देखी हैं हमने, वो चिलमन में मचलती आँखें।।
आँखों आँखों में, कभी बात हुआ करती थी।
क्या हुआ अब कि, उनसे नहीं मिलती आँखें।।
जब तलक साथ थे तुम, चमकती रहीं दिन भर।
शाम जब तुम गए, फिर रात भर बरसी आँखें।।
रात में रूह कंपा देता है, जंगल का सफर।
घूरती झाड़ियों से, जब कभी जलती आँखें।।
मेरा तो काम ही है ख़्वाब दिखाना तुझको ।
तूने क्या सोच के, ख़ुद बंद करली आंखें ।।
कर्मेंद्र
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