वक्त
वक्त की क़ैद में तो सब ही है,
सूरज, चाँद से लेकर ग्राहों तक
ना कर तू इतना ग़ुरूर क्योंकि
आज तेरा है, कल मेरा होगा
वक्त वक्त की बात है
दिन के बाद रात है
फ़रिश्तों का साथ है
फिर घबराने की क्या बात है
जो बीत गया यादों में सिमटा हुआ है
गुज़र जाने के बाद वो लौट के ना आने वाला है
ना इतरा तू वक्त के आगे क्योंकि
वक्त की कुछ ऐसी है फ़ितरत
नूर को भी बेनूर बना देता है ।
-करिश्मा संजीव मेहरोत्रा
