पशचाताप की आग से लगी है जहन में जल रहा हूँ मैं मानसिक दहन में! झूठा मैं यहाँ भी ना था , मिथ्या मैंने बहां भी नहीं बोला था पर सबने अपना एक तराजू लेकर मेरे जीवन को तोला था मोहब्बत बांटते बांटते फ़कीर हो चला था मैं , आज मुझे खुद मोहब्बत के २.5 अक्षर की खार थी , हमने दो बातें ही तो की थी प्यार की , पर हम पे इलज़ाम था की हमने की इंसानियत शर्मसार थी ! खुद को सच्चा साबित करते करते थक गया था मैं , अब तो झूठा साबित करना आसान था , मोहब्बत की अदालत में आज शक बकील बन के खड़ा हमारे दरम्यान था ! मोहब्बत ए अदालत मैं हार रहे थे हम , वैसे हमें कभी हारना गंवारा ना था , पर उनसे जीत कर भी हम हार ही जाते , वक़्त ने कभी हमें बनाया ऐसा हालात ए बेचारा ना था ! पर कशमकश तो देखिये हमारे हार मानते ही हम गुनेहगार मान लिए गए , वक़्त की हाथों हम यूँ ही मुजरिम जान लिए गए ! हमें सजा की तौर पे मोहब्बत ना करने का हुक्म सुनाया गया , कुछ इस तरह हमारे हर पल धड़कते दिल को बंदी बनाया गया ! कुछ इस तरह हमारे ज़हन को खुदखुशी का रास्ता सुझाया गया