मैं गीता  हूँ  मैं  आसिफा  हूँ  , मैं  एक  नाजुक  कली  हूँ ,

मेरे  नाम  अलग  अलग  हैं  पर  मैं एक ही हूँ और  तुम  सबके  आँगन  मैं  पली  हूँ !

कभी  मुझे  खिलने  से  पहले  ही  कुचल  दिया , तो  कभी  बड़े  होकर  दहेज़  के  लिए  जली  हूँ   !!

मैं आसिफा  हूँ  मैं  गीता  हूँ  , मैं  एक  नाजुक  कली  हूँ !!!

आज फिर कुछ दरिंदे  जानवरों  ने मुझ  मासूम  कली को मसल  दिया !

आज फिर कुछ  बाहसियो ने मानवता का क़त्ल किया !

आज फिर इस  नाज़ुक कली की चीख़ें किसी को सुनाई ना दीं !

आज फिर मेरी मासूमियत किसी को दिखायी ना दी !

क्या सिर्फ़ लड़की होना हमारी  ग़लती है !

क्यूँ हमारी  ज़िंदगी शुरू होने से पहले ही ढलती है !

क्यूँ हमको  सिर्फ़ आनन्द की बस्तु माना जाता है ,

वो माँ है, बहन है , बेटी है , पत्नी है वो सबके जीवन का आधार है !

इस  नारी शक्ती को क्यूँ उस  पुरूष प्रधान  समाज ने कर दिया लाचार है !!

तुम ऐसे पहनो , तुम ऐसे दिखो , क्यूँ समाज ना सारी बंदिसो को सिर्फ़ हमपर  थोपा है !

क्यूँ इस तथाकथित समाज ने हमको  सदीयों से आगे बढ़ने  से रोका है !!

क्यूँ तुम्हारी  मानसिकता एक नारी को लेकर इतनी  बीमार है !

इतने ज़ुल्म नारी पर डहा   कर वो  इसको  बुलाते समाजिक  शिष्टाचार  हैं !!

चाहे  नाम बदल गए, कल आसिफ़ा थी आज गीता है !

पर हर तरह  से  ज़ुल्म सिर्फ़ नारी पर बीता है !!

जिनको अपने धर्म का एहसास भी ना था क्यों  तो उन बच्चीयो को भी धर्म  में  बाँटा है !

उस नारी शक्ति का बस इतना  सा  मूल्य तुमने  आँका है !!

वो भी क्या वक़्त था जब सीता माता को रावण से मुक्त करने के  लिए सब जीव एक साथ लड़े थे !

कोई धर्म या जात नहीं थी , सब सिर्फ अन्याय के ख़िलाफ़ एक साथ खड़े थे !!

मत करो इतना  अत्याचार कहीं नारी माँ काली का रूप  ना धर ले !

नहीं रखूँगी ऐसे पापी पुरूषों को , कह कर तुम्हारी ज़िंदगी की सुबह ना हर ले !

आज फिर कुछ दरिंदे  जानवरों  ने एक मासूम  कली को मसल  दिया !

आज फिर कुछ  बाहसियो ने मानवता का क़त्ल किया !