ज़माने की बंदिसें इतनी हैं की हम कभी इकरार ए मोहब्बत ना कर पाए !
उनमें भी नादानियाँ इतनी हैं की उन्होंने हमारे आंशु तो कई बार पोंछे , पर आंशुओं का दर्द कभी ना पढ़ पाए !!
कितने ही डरीयों को समंदर से मोहब्बत थी , पर कुछ ही समंदर में समाके इश्क़ की दास्ताँ गढ़ पाए !
कितने ही मेघ वरसने की होड़ में थे पर वारिस की बूँदे वो ही बने जो आख़िरी दम तक लड़ पाए !
ज़माने की बंदिसें इतनी हैं की हम कभी इकरार ए मोहब्बत ना कर पाए !
रास्ता आसान ना था मोहब्बत का पर वो तो कुछ क़दम का ही सफ़र कर पाए !
ज़िंदगी के कितने गीत संग लिखे थे पर तुम उनमें आशिक़ी का
संगीत ना भर पाए !
बदक़िस्मती तो देखो ना साथ जी पाए ना तनहा मर पाये !
ज़माने की बंदिसें इतनी हैं की हम कभी इकरार ए मोहब्बत ना कर पाए !
जाने क्या गुस्ताखी हुई तेरी मोहब्बत ए इबादत में, चाहकर भी तेरे दिल में ना उतर पाए !
शायद कुछ तो था उनके मन में,पर जाने क्या बात हुई वो कभी हमारी मोहब्बत में ना सँवर पाए !
राहें ए इश्क़ आसान नहीं , शायद इसी राह से वो ना गुज़र पाए !
ज़माने की बंदिसें इतनी हैं की हम कभी इकरार ए मोहब्बत ना कर पाए !
