हर बात का एक दौर है

कल जो बीत गया कोई और है

क्या सबब रहा होगा, कोई वास्ता होगा

मैं ही छूट रहा हूं, मुझतक ही ये दौड़ है


लम्हा लम्हा बहता हूं मैं

गुस्ताख़ वक्त भी एक चोर है

ना बदलता सूरत, ना सीरत का नया

बहार का हुनर इसमें, कभी ये सेहरा का शोर है