टहलते टहलते वो चले जा रही थी,
ये सोच न जाने क्या सोचे जा रही थी।
रोक कर पूछ लेता हूँ उससे कुछ सवाल,
वो उन सवालों के जवाब मुझसे ही पूछे जा रही थी।
सवालों के जवाब न मिले,
पर देखा सोच को,
वो हकीकत को छोड़ सपनों मे जीए जा रही थी।
कुछ हकीकत में उलझी हुई,
कुछ सपनों में सुलझी हुई,
वो अपने उलझे हुए रास्तों को सुलझाए जा रही थी।
करन/@KaranRajput0911/@Kavishala_Hindi


