ये बेरूखी है उन हवाओं की,जिनकी कभी कद्र ना हुई,करके जहर के हवाले,इंसान शान से चला जा रहा था।लेकिन जब हवाओं ने बदला अपना रूख़,तो होना पड़ा बेबस उन हवाओं के आगे,और करना पड़ा खुद को कैद उन चार दीवारों में।