मैं तो आता हूँ,

तेरे दर पर ए मेरे खुदा,

बस तेरे दीदार को,

पर लोग इसे मेरा स्वार्थ समझ लेते है,

तो लोग कभी-कभी,

मुझसे मेरी मजहब पूछ लेते है,

वो ना समझ लोग,

तुम्हें मजहब में बाँट कर,

खुद को तुम्हारा रक्षक,

तो मुझे तुम्हारा भक्षक बना देते है,

आ जाओ इक बार दीदार को,

मैं इसकी इबादत करता हूँ,

ये दर है सबका बिना किसी मजहब के,

मैं इसे कैसे साबित करूँ?

आज तो आकर मिल जाओ,

तुम मुझसे,

मुझे सही और इन्हें गलत साबित कर जाओ,

बस मैं तुमसे इतनी सी इल्तिजा करता हूँ।

करन/@karanrajput0911/@kavishala_hindi