कविता 03.06.21



छत पर आकर निहारोगी जब आसमान ,

मैं ही याद आऊंगा।

अपने हाथों में लेकर जब पढ़ोगी क़ुरान ,

मैं ही याद आऊंगा।


ज़िंदगी की भागदौड़ से जब हो जाओगी परेशान ,

जब सारे त्योहारों के बाद खाली लगेगा दालान ।


सब कुछ पाकर , कुछ बनकर खुद पर करोगी अभिमान ,

सब पाने के बाद जब कुछ नहीं जैसा लगेगा दरमियान ,


ग़म के गीतों से चिढ़ कर जब छेड़ोगी प्यार की तान ,

जब छज्जे के नीचे से कोई गुजरेगा सख्श अनजान ,


पेड़ों को देखोगी , तितली को छुओगी , लाओगी मुस्कान ,

सांझ को बैठोगी , या रात को सोओगी , या देखोगी रेहान ।


अकेले चलोगी और ढूँढोगी साथी का एहसान ,

बस के सफर में, ट्रेन की खिड़की पर , या हो दुकान ,


ख़ुद के फैसलों से जब आयेंगे एक दिन तूफ़ान ,

तब न रोज़े काम आयेंगे , न दीन ओ मज़हब ईमान ।

मैं ही याद आऊंगा ।


तब भी मैं भाग कर , तुम्हें गले लगाकर ,

तुम्हारे दुखों को , अपना बना कर ,

तुम्हें सारी बलाओं से बचाऊँगा ,


तुम्हारे आंसू पोंछ कर , कुछ न बीता सोच कर ,

अपने अहम को भी खरोंच कर ,

तुम्हें अपनी बाहों में छुपाऊंगा ।

तुम्हें फिर से अपना बनाऊंगा ।