अक़्सर जब दिल बेचैन होता है...
उनसे बतियाने का मन करता है...
खुद को खूब समझती हूँ...
फिर खुद से हार कर...
जब मैं घर फ़ोन करती हूँ...
पापा फ़ोन उठाएंगे...
यह आशा करती हूँ...
माँ से कुछ देर बतियाने के बाद...
होठों तक एक सवाल आता है...
की 'माँ पापा कहाँ हैं?'
इस सवाल को आवाज़ नहीं दे पाती...
मानो जेहेन में कहीं...
एक सच्चाई से वाकिफ़ हूँ...
इस ख़ामोशी का मतलब...
शायद माँ जानती है...
जैसे माँ बाक़ी सब भी जानती है...
कुछ क्षण खामोश रहकर...
मैं और माँ एक दूसरे से कहते हैं...
'अपना ध्यान रखना...'
अक़्सर जब पापा से बतियाने का मन करता है...
बेचैन होकर मैं घर फ़ोन करती हूँ...।