सर्द हवा, महकता समां और ये रात धीर–धीरे ढल रही है।
पत्तों से लिपटी सबनम की बूंदें,
सुबह होने को है और वो भी पिघल रही हैं।
बाहर बहुत अंधेरा है, पर ये नींद है।
...जो आंखों में अब तलक जल रही है
कहती है प्रेम नहीं है, रात भर से मैं लिख रहा हूं और वो पढ़ रही है
मैं यहां रात भर से सोया नहीं हूं, बस इतना प्रमाण ही काफ़ी है की शायद तू भी जग रही है।
सर्द हवा, महकता समां और ये रात धीर–धीरे ढल रही है।
कान्हा

