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कुँआरी मुट्ठी

युद्ध नहीं है नाश मात्र ही

युद्ध स्वयं निर्माता है,

लड़ा न जिस ने युद्ध राष्ट्र वह

कच्चा ही रह जाता है,

नहीं तिलक के योग्य शीश वह

जिस पर हुआ प्रहार नहीं,

रही कुँआरी मुट्ठी वह जो

पकड़ सकी तलवार नहीं।


हुए न शत-शत घाव देह पर

तो फिर कैसा साँगा है?

माँ का दूध लजाया उसने

केवल मिट्टी राँगा है,

राष्ट्र वही चमका है जिसने

रण का आतप झेला है,

लिये हाथ में शीश, समर में

जो मस्ती से खेला है।


उन के ही आदर्श बचे हैं

पूछ हुई विश्

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