बिका हुआ खरीददार हुँ मैं
इंसान हुँ लाचार हुँ मैं
मुश्ताक़ था मैं भी शायद
फिलहाल बेज़ार हुँ मैं
रुस्वा-ए-जहाँ में जी रहा
किसी का गुनहगार हुँ मैं
वफ़ा का कोई शहादत नही
पर यकीनन वफ़ादार हुँ मैं
खुशियाँ ख्वाब सी लगती हैं
दु:ख-दर्द का तलबगार हूँ मैं
उम्र-ए-दराज ख्वाहिश नहीं
जो मौत का दावेदार हुँ मैं
-कनक लखेसर


