इक दरख़्त मेरे आँगन का , सूखने-सा लगा है
टहनी-टहनी बिखर गई , जड़ बचा पाओगे क्या
झुर्रियां पड़ी चेहरों पर , लड़खड़ा जो रही उम्र
धुँधली होती नज़रें उनकी , रस्ता दिखा पाओगें क्या
क्या ख्वाहिश क्या सपनें , तुझसे ही तो थे उनके
खामोश पड़ी इन दीवारों को , घर बना पाओगे क्या
मजबूरीयों से समझौता कर , खुशियाँ हमें देते थे
सज़दे में दुआएं उनकी , मुकम्मल कर पाओगें क्या
सारी जिंदगी लगा दी , तुझको काबिल बनाने में
थक गया वो पिता अब , तुम राहत दे पाओगें क्या
-knk


