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विज्ञापन की तारीफ़े- कामिनी मोहन।

विज्ञापन की तारीफ़े

नैतिक हो या कि अनैतिक
दोहराए न जाने पर
समय के साथ कमज़ोर हो जाती हैं।
मानसिक क़रार के बावजूद
विस्मृत हो जाती है।


क़िस्से होते हैं सिर्फ़ ज़ेहन के
सफ़र होते हैं सिर्फ़ धड़कन के
दुनिया को साहस देकर
योग-संयोग की सड़क पर
गतिमान रहने को आते हैं।
कभी संगीत-कभी नृत्य की भाषा में
कविता का दरवाज़ा खटखटाते हैं।


क्योंकि,
कविता की आत्मा का ख़्याल
महज़ बाज़ार और महफ़िल के ल

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