( क़ितआ ) - धमकियाँ दर्द की

धमकियाँ   दर्द  की  ख़ुशियों  पर  है  भारी
ऐसा  डर जैसे  रात  स्याही बरसीं  हो भारी
रूह है आज़ाद वक़्त भले तन-बदन लूट ले
क्यूँ  डरे  चलो  आज  तो  जी भर के जी ले।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।