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मेरे चारों ओर मनुष्य हैं बड़े- © कामिनी मोहन पाण्डेय।

मेरे चारों ओर मनुष्य हैं बड़े,
अपार मन का भार लिए हैं खड़े। 

वो उदार है जो राह में पड़े,
गिरे मन का भार थामने को खड़े। 

उनके स्वागत को क्या कहे,
उदारता की चादर ओढ़े जो रहे। <
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