किरदार निभाओ तो
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।
मनुष्यता का किरदार निभाओ तो
सदिया अक़्सर याद करती है।
यदि नज़र महान और मोहिनी हो तो
दुनिया शानदार दिखती हैं।
आँखे ब्लैक एण्ड व्हाइट होने के बावजूद
अनंत रंगों को देख लेती हैं।
क़रीब से काग़ज़ पर लिखे को भले न देखे
थोड़ी दूर से सब साफ़ देख लेती है।
ज़ेहन में जो भीड़ घुस गईं है
ट्रैफ़िक के बीच से गुज़र जाती है।
सब रास्ते रूक जाते हैं
जब ख़ुशी निकल जाती है।
तंग बाज़ार में बीच सड़क पर रूककर
बाज़ार ज़्यादा साफ़ दिखाई देता है।
जिजीविषा भाव-भंगिमाओं की
धुँधलके में स्वाँग नहीं करता है।
तिरोहित प्रेम और आकुलता
सिर्फ़ काग़ज़ की छाती पर नृत्य करता है।
शब्दों से भारी हैं भावनाएँ
नि:शब्द मौन भी बोला करता है।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।


