ख़ुद को परिभाषित करना अनभिज्ञता

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ख़ुद को परिभाषित करना अनभिज्ञता - © कामिनी मोहन पाण्डेय।

भावना के ज्वार में कविता जन्म लेती हैं। फिर भी, अपने आप के लिए या दूसरों के लिए कई बार लोग अपने आप को परिभाषित करने लगते हैं। इस बात से चिंतित होते हैं कि दूसरे आपको कैसे परिभाषित करते हैं। लेकिन, हम इस बात से आनभिज्ञ रहते हैं कि अपने आपको या दूसरों को परिभाषित करना ख़ुद को सीमित करना है। यह ख़ुद की भी और हमारे सामने वाले की भी समस्या है।
हम जब भी लोगों के साथ बातचीत करते हैं, तो एक समारोह, एक भूमिका का रूप नहीं होना चाहिए, बल्कि जागरूक उपस्थिति का रूप होना चाहिए। यहाँ परिभाषित का सवाल कुछ खोने और पाने को लेकर है। हम यह सोचते हैं कि हम कुछ ऐसा खो सकते हैं जो हमारे पास है, लेकिन हम यह नहीं सोचते कि हम कुछ ऐसा नहीं खो सकते हैं जो हम स्वयं है। तो इस बात के लिए हमें अपना सबसे बड़ा शिक्षक बनना चाहिए। हम जिस परियोजना को शुरू करना चाहते हैं वह हमारा सबसे बड़ा शिक्षक है। कुछ शुरू करने के लिए हमें ख़ुद को महान समझने की ज़रूरत है।  परियोजना पर किया गया कार्य हमें हर स्टेप पर शिक्षित करता जाएगा।
हमें अपने विश्वास को सीमित नहीं करना चाहिए। क्योंकि कोई भी रोल मॉडल अचानक से शुरू नहीं होता है। जितना अधिक हम लोगों की सोच से बचते हैं, उतना ही सीखते हैं, उतना ही विकसित होते हैं। अपने आप से वादा करना चाहिए कि हर दिन हम कुछ ऐसा करेंगे जो हमें आगे बढ़ाएगा और हमें अपने समग्र लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करेगा।
हम अपनी दृष्टि के लिए स्वयं प्रतिबद्ध है। अंतिम परिणाम को जानते, मानते और देखते हुए महसूस करना चाहिए जैस
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