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कस्तुरी जैसे मृदगंध - कामिनी मोहन।

कस्तुरी जैसे मृदगंध
बहती हवा आसपास है
साँस संग आती जाती
बाहर-भीतर
पर मृग मन
जंगल-जंगल ढूँढ़ता
देखता आकाश है।

मृगमरीचिका-सी तृष्णा
गर्म रेत-सी उड़ती
धुंधलका आँखों पर
पलकों तले देखता विकास है।

पानी को तलाश
साफ़ भूख-प्यास देखने की
आख़िर तक उठाव-गिराव में
समतल से भटकाव है।
सदियों से नदी की छाती पर
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